इंदौर। नाटक 'राजू, राजा, राम और...मैं" एक ऐसा नाटक जिसमें हंसी, दु:ख, वेदना, वादा और वादाखिलाफी जैसे तमाम भावों का समावेश। सिचुएशन व डायलॉग के ताने-बाने में बुनी कॉमेडी के साथ गीत-संगीत और कहानी का फिल्मी अंदाज। कुछ ऐसे ही पैकेज को लिए रविवार की रात डीएवीवी ऑडिटोरियम में इस नाटक का मंचन किया गया। फिल्म और टीवी कलाकारों को एक मंच पर लाए इस 150 मिनट के नाटक ने लोगों को जमकर हंसाया। यह नाटक रंगमंच और फिल्मी सेट का मिलाजुला रूप लिए था।
नाटक की कहानी 11 पात्रों को लिए 'वसीयत के लालच" के इर्द-गिर्द घूमती है। केदार शिंदे द्वारा लिखित व निर्देशित यह नाटक एक ही कलाकार को चार अलग-अलग किरदार बनाकर एक ही समय में मंच पर लाने का बेहद उम्दा उदाहरण है। नाटक की कहानी मशहूर बिजनेसमैन मदन सुखनंदानी की दूसरी पत्नी मीरा और मैनेजर मि. दलाल के प्रेम से शुरू होती है, जिसे मदन सुखनंदानी जान जाता है।
सिचुएशन कुछ ऐसी बनती है कि मीरा मदन के सिर पर बोतल मारती है और समझती है कि वह मर गया। कुछ महिनों बाद वकील वसीयत दिखाकर कहता है कि मदन सुखनंदानी अपनी जायदाद पहली पत्नी मनोरमा, चाचा जनार्दन और मीरा के नाम कर गया है, लेकिन उसपर उनके साइन नहीं हैं। ऐसे में ये तीनों रिश्तेदार राजू, राजा गलगले और रामकृष्ण नामक व्यक्ति को नकली मदन सुखनंदानी बनाकर साइन कराने लाते हैं। बाद में असली मदन सुखनंदानी आता है और इन तीनों रिश्तेदारों को जायदाद से बेदखल कर देता है।
सिचुएशन को संभालता अभिनय
इस पूरे नाटक में मदन, राजू, राजा और राम की भूमिका एक ही कलाकार फिल्म अभिनेता 'शरमन जोशी" ने निभाई। स्टेज पर चारों कलाकारों का एक साथ होना और अलग होने पर भी एक ही दिखने का तरीका दर्शकों को काफी पसंद आया। डायलॉग में कुछ पंच तो हंसाने में कामयाब रहे पर कुछ सीन्स ने नाटक को उबऊ भी बना दिया।
कई बार लगा कि नाटक को अनाश्यक बढ़ाया जा रहा है। नाटक इस प्रकार दर्शाने की कोशिश की गई मानों वह थियेटर नहीं बल्कि फिल्म हो। इस लिहाज से यह दोनों ही श्रेणियों में खरा नहीं उतर पाया। कुछ दृश्यों में शरमन जोशी व अन्य कलाकारों की ओवरएटिंग भी गले नहीं उतरी। हां चंद डायलोग के साथ दृश्यों का तालमेल खूब बन पड़ा। नाटक में शरमन जोशी के साथ राजेश भोंसले, राजेश दुबे, राजेश सिंह, नम्या सक्सेना, प्रदीप वेनगुलेंकर, शिवानी कराड़कर व ईशा वधनेकर ने मुख्य भूमिका निभाई।