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इंदौर में 1849 में हाथी चलाकर परखी गई थी कृष्णपुरा पुल की मजबूती, अब तक उठा रहा ट्रैफिक का भार

Engineers Day 2026: कृष्णपुरा पुल का निर्माण होलकर शासनकाल में हुआ था। उस समय मल्हारगंज, नंदलालपुरा और सराफा इंदौर के प्रमुख व्यापारिक केंद्र थे।

By Kuldeep BhawsarEdited By: Prashant Pandey
Publish Date: Tue, 15 Sep 2026 09:00:27 AM (IST)Updated Date: Tue, 15 Sep 2026 09:06:22 AM (IST)
इंदौर में 1849 में हाथी चलाकर परखी गई थी कृष्णपुरा पुल की मजबूती, अब तक उठा रहा ट्रैफिक का भार
1886 में कृष्णपुरा पुल : पुल से गुजरती बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ उस दौर की आवाजाही की तस्वीर पेश करती है। सौजन्य : इतिहासकार जफर अंसारी

HighLights

  1. बारिश के दिनों में कान्ह नदी का जलस्तर बढ़ने पर नदी पार करना मुश्किल हो जाता था
  2. कुछ हिस्सों का संपर्क व्यापारिक क्षेत्रों से टूट जाता था और नावों का सहारा लेना पड़ता था
  3. पुल का निर्माण केवल आवागमन की सुविधा नहीं, बल्कि व्यापारिक जरूरत भी था

कुलदीप भावसार, नईदुनिया, इंदौर। 177 साल पहले जब इंदौर में कृष्णपुरा पुल बनकर तैयार हुआ होगा, तब उसकी मजबूती जांचने के लिए आज जैसे तकनीकी साधन उपलब्ध नहीं थे। इतिहासकारों के अनुसार, पुल की ताकत परखने के लिए उस पर हाथी चलाए गए थे। गजराजों के कदमों ने इसकी मजबूती की परीक्षा ली और वर्ष 1849 में बनी यह होलकरकालीन संरचना समय की कसौटी पर खरी उतरती चली गई।

आज भी कृष्णपुरा पुल पुराने शहर की आवाजाही का अहम हिस्सा है। इंजीनियर्स डे (15 सितंबर) पर इसकी कहानी उस दौर की इंजीनियरिंग क्षमता की याद दिलाती है, जब सीमित साधनों में भी टिकाऊ निर्माण किए जाते थे।

जब कान्ह के उफान से थम जाता था शहर

कृष्णपुरा पुल का निर्माण होलकर शासनकाल में हुआ था। उस समय मल्हारगंज, नंदलालपुरा और सराफा इंदौर के प्रमुख व्यापारिक केंद्र थे। सामान बैलगाड़ियों और घोड़ागाड़ियों से पहुंचता था। बारिश के दिनों में कान्ह नदी का जलस्तर बढ़ने पर नदी पार करना मुश्किल हो जाता था। शहर के कुछ हिस्सों का संपर्क व्यापारिक क्षेत्रों से टूट जाता था और लोगों को नावों का सहारा लेना पड़ता था। ऐसे में पुल का निर्माण केवल आवागमन की सुविधा नहीं, बल्कि व्यापारिक जरूरत भी था।


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इतिहास का साक्षी, आज भी शहर के काम

कृष्णपुरा पुल ने इंदौर के बदलते दौर को करीब से देखा है। इतिहासकार जफर अंसारी के अनुसार, आजादी के बाद कृष्णपुरा पुल के नजदीक एक और पुल बनाया गया, जो प्रकाश टॉकीज से राजवाड़ा की ओर जाता है। रियासतकाल में यहां ट्रैफिक संभालने के लिए लकड़ी की चौकी बनाई गई थी। यही चौकी शहर की शुरुआती यातायात व्यवस्था का हिस्सा थी। बाद में वर्ष 1961 में मृगनयनी के पास मध्य प्रदेश की पहली ट्रैफिक लाइट लगाई गई।

क्यों मनाते हैं इंजीनियर्स डे?

भारत में इंजीनियर्स डे 15 सितंबर को महान अभियंता और भारत रत्न सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जयंती पर मनाया जाता है।

पुलों का इतिहास और शहर का विस्तार

  • नवलखा पुल (1820) : इंदौर का पहला पुल, अंग्रेज रेजिडेंट गेराल्ड वेलेजली ने बनवाया।
  • कृष्णपुरा पुल (1849) : होलकरकालीन पुल, पुराने शहर और व्यापारिक क्षेत्रों की कड़ी।
  • चंद्रभागा पुल (1901) : ऐतिहासिक आवाजाही और स्थापत्य की विरासत।
  • शास्त्री ब्रिज (1953) : शहर के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों को जोड़ने वाला पुल।

1918 में गेडेस ने देखी थी इंदौर की नई तस्वीर

इंदौर की शुरुआती आधुनिक नगर योजना वर्ष 1918 में स्काटिश नगर नियोजक सर पैट्रिक गेडेस ने तैयार की थी। यह योजना ब्रिटिश सरकार की नहीं, बल्कि होलकर दरबार की पहल पर बनी थी। गेडेस ने शहर को केवल सड़कों और इमारतों का समूह नहीं माना।

उनकी सोच में पुराने शहर की पहचान बचाते हुए बाजारों, आवासीय क्षेत्रों, खुले स्थानों और सार्वजनिक सुविधाओं का संतुलित विकास शामिल था। राजवाड़ा और पारंपरिक बाजारों को केंद्र में रखकर शहर के विकास की कल्पना की गई थी। उनकी योजना का मूल विचार था- पुराने शहर को मिटाना नहीं, सुधारकर आगे बढ़ाना।