
इंदौर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। हमारी संस्कृति हमारी धरोहर का उद्देश्य लिए श्री पालीवाल बजरंग मंडल द्वारा 2 जून शाम 7 बजे जूना तुकोगंज स्थित श्री पालीवाल ब्राह्मण समाज 44 श्रेणी धर्मशाला में नागौर के राजा अमरसिंह राठौड़ नाटक का मंचन किया जाएगा। स्व. भंवरलाल जोशी की स्मृति में हो रहे इस नाटक के माध्यम से नागौर का इतिहास, सत्ता परिवर्तन की कहानी व अमरसिंह राठौड़ की वीरगाथा को प्रदर्शित किया जाएगा।
श्री पालीवाल बजरंग मंडल के योगेश जोशी ने बताया कि मांगीलाल जोशी के निर्देशन में राजस्थान, मुंबई और इंदौर के 20 कलाकार प्रस्तुति देंगे। इस नाटक में लगभग छह किरदार मुख्य भूमिका में रहेंगे जो अमरसिंह राठौड़ की वीरता, साहस, पराक्रम व उनकी दूर दृष्टि को नाटक के माध्यम से दर्शाएंगे। नाटक में अमरसिंह राठौड़ का किरदार निर्मल जोशी निभाएंगे। इसी के साथ शाहजहां का किरदार कैलाश पुरोहित, सलामत खां का सुखदेव जोशी, हाड़ी रानी का जगदीश दवे, रामसिंह का देवेश जोशी, शेर खां का धर्मेंद्र सिलोरा, अर्जुन गौड़ (मुख्य खलनायक) का अभिनय ओम प्रकाश जोशी करेंगे।
यह है इतिहास - अमरसिंह राठौड़ मारवाड़ राज्य के प्रसिद्ध राजपूत थे। वो 17वीं सदी में भारत के मुगल सम्राट शाहजहां के राज दरबारी थे। अपने परिवार द्वारा निर्वासित करने के बाद वो मुगलों की सेवा में आए। उनकी बहादुरी और युद्ध क्षमता के परिणामस्वरूप उन्हें सम्राट द्वारा शाही सम्मान और व्यक्तिगत पहचान मिली। इसके बाद उन्हें नागौर का सूबेदार बनाया गया बाद में उन्होंने ही यहां शासन किया। सन् 1644 में उनकी अनधिकृत अनुपस्थिति में सम्राट द्वारा कराधान से नाराज हुए और कर लेने के लिए जिम्मेदार सलाबत खान का तलवार से गला काट दिया था। उनका वर्णन राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पंजाब के कुछ लोकगीतो में प्रसिद्धि प्राप्त कर चुका है।
साले ने लालच में आकर दिया धोखा - शाहजहां ने दरबार में सभी के समक्ष शर्त रख दी कि अमरसिंह राठौड़ को मारने वाले को जागीरदार बना दिया जाएगा। हालांकि कोई भी अमरसिंह के साथ दुश्मनी मोल लेने के लिए तैयार नहीं था। लेकिन दरबार में अर्जुन सिंह जो अमरसिंह के साले थे, ने लालच में आकर इस चुनौती को स्वीकार कर लिया। अर्जुनसिंह ने अमरसिंह से कहा कि शाहजहां को अपनी गलती का एहसास हो गया है, और वह अमरसिंह जैसा योद्धा नहीं खोना चाहते। हालांकि अमरसिंह को शुरुआत में इस बात पर विश्वास नहीं था, परंतु वे अर्जुनसिंह के विश्वासघात की कला के झांसे में आ गए और अर्जुनसिंह के हाथों अपने प्राण गंवा बैठे।