
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर : राहुल गांधी की ‘छात्रों की गूंज’ का पांचवां पड़ाव इंदौर कई मायनों में पहले चार कार्यक्रमों से अलग दिखाई दिया। कोटा में जहां शिक्षा व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव केंद्र में था, देहरादून में पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था, प्रयागराज में प्रतियोगी छात्रों और रोजगार तथा पुणे में जोन-जी, लोकतंत्र और संविधान जैसे विषय प्रमुख रहे, वहीं इंदौर में इन मुद्दों का दायरा बढ़कर सीधे ‘सिस्टम’ तक पहुंच गया। यानी अभियान की दिशा छात्रों की समस्या से व्यवस्था पर सवाल की ओर बढ़ती दिखी। कांग्रेस के अभियान की शुरुआत भी शिक्षा, पेपर लीक और रोजगार जैसे मुद्दों से हुई थी।
इंदौर में राहुल गांधी ने छात्रों को केवल परीक्षा और नौकरी से जुड़े सवाल पूछने वाला वर्ग नहीं, बल्कि व्यवस्था पर सवाल उठाने वाली ताकत के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि ‘सिस्टम’ छात्रों से इसलिए डरता है क्योंकि वे सवाल करते हैं। इसी क्रम में उन्होंने शिक्षा, भर्ती, न्यायपालिका, चुनाव आयोग, मीडिया और संस्थाओं की भूमिका को एक ही राजनीतिक विमर्श में जोड़ दिया। उनके भाषण में ‘छात्र बनाम सिस्टम’ का यह फ्रेम पूरे कार्यक्रम पर हावी रहा।
इंदौर की खासियत यह भी रही कि राष्ट्रीय मुद्दों के साथ मप्र के युवाओं की ठोस समस्याएं सीधे मंच पर आईं। एमपीपीएससी की भर्तियों में देरी, लंबित परिणाम, रिक्त पद, नर्सिंग विद्यार्थियों की समस्याएं और 13 प्रतिशत पदों के अटकने जैसे मुद्दे छात्रों ने उठाए। राहुल गांधी ने प्रदेश के शिक्षक अभ्यर्थियों के आंदोलन में शामिल होने की पेशकश भी की।
यही वह बिंदु है जहां ‘छात्रों की गूंज’ का राजनीतिक अर्थ बदलता दिखाई देता है। कोटा में समस्या की पहचान, देहरादून में परीक्षा व्यवस्था पर सवाल, प्रयागराज में रोजगार, पुणे में जेन-जी और इंदौर में ‘सिस्टम’ की राजनीति। पांच कार्यक्रमों का यह क्रम बताता है कि कांग्रेस छात्र मुद्दों को अलग-अलग समस्याओं के रूप में उठाने के साथ उन्हें व्यापक राजनीतिक जवाबदेही से जोड़ने का प्रयास कर रही है।
इंदौर का चयन भी इस लिहाज से महत्वपूर्ण है। कांग्रेस के लिए यह केवल एक और छात्र संवाद नहीं रहा। कार्यक्रम में स्थानीय समस्याओं को राष्ट्रीय विमर्श से जोड़कर मध्यप्रदेश के युवा वर्ग के बीच अपनी राजनीतिक भाषा रखने का प्रयास दिखाई दिया। बाहर बड़ी संख्या में छात्रों द्वारा स्क्रीन पर कार्यक्रम देखे जाने की रिपोर्ट भी सामने आई। इस तरह ‘छात्रों की गूंज’ अब केवल शिक्षा सुधार का अभियान नहीं रह गई है। इंदौर में इसका नया राजनीतिक संदेश था—छात्र केवल नौकरी और परीक्षा के लिए सवाल नहीं करते, वे व्यवस्था से भी सवाल करते हैं। यही बदलाव इस पांचवें पड़ाव को कांग्रेस की युवा राजनीति के लिहाज से अलग बनाता है।
इधर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इंदौर प्रेस क्लब में पत्रकारों से चर्चा में “छात्रों की गूंज” को लेकर कहा कि जंतर-मंतर से उठी छात्रों की आवाज इंदौर में जनसैलाब बनकर गूंजी है इस आवाज को दबाया नहीं जा सकता। इस कार्यक्रम के माध्यम से देश के युवाओं को अपनी बात रखने का मंच मिला है।
युवाओं ने बड़ी संख्या में पहुंचकर यह स्पष्ट कर दिया कि शिक्षा, रोजगार, भर्ती परीक्षाओं, पेपर लीक, परीक्षा परिणाम और अपने भविष्य से जुड़े सवालों पर वे चुप बैठने वाले नहीं हैं। पटवारी ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि भाजपा ने आयोजन को कभी “झूठ की गूंज”, कभी “स्क्रिप्टेड ड्रामा” और कभी “सर्कस” बताने का प्रयास किया, लेकिन इंदौर की जनता और युवाओं ने मैदान में उतरकर इसका जवाब दे दिया।
जंतर-मंतर पर युवाओं द्वारा उठाई गई आवाज को बदनाम करने के लिए उन्हें “दिमागी नक्सल” तक कहा गया और आंदोलन पर विदेशी फंडिंग जैसे आरोप लगाए गए। इंदौर में भी आयोजन को लेकर तरह-तरह की रुकावटें खड़ी की गईं। “झूठ की गूंज” के पोस्टर लगाए गए, परिवहन को प्रभावित करने के आरोप सामने आए और दूर-दराज से आए युवाओं को कड़ी धूप में कई किलोमीटर पैदल चलकर आयोजन स्थल तक पहुंचना पड़ा। लेकिन युवाओं का उत्साह और उनकी आवाज को कोई रोक नहीं सका।
पटवारी ने कहा कि जेन-जेझ और जेन-अल्फा के साथ उनके अभिभावकों की भागीदारी ने यह साबित किया कि शिक्षा और रोजगार केवल छात्रों का नहीं, बल्कि हर परिवार का सवाल है। कांग्रेस का सवाल आज भी वही है कि शिक्षा हर बच्चे का अधिकार है, तो केजी से पीजी तक शिक्षा मुफ्त और अफोर्डेबल क्यों नहीं हो सकती। पटवारी ने कहा कि हमने पहले ही कहा था कि आनलाइन रजिस्ट्रेशन कराने वाले छात्रों में से दस प्रतिशत भी मैदान में आएं तो बड़ी संख्या होगी। अब लाखों के ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन और मैदान में उमड़े युवाओं को पूरा देश देख रहा है।
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