कपिल नीले, नईदुनिया, इंदौर। इंदौर के करीब जंगल में गोंद माफिया फिर सक्रिय हो गए हैं। तीन दिन पहले मानपुर रेंज की टीम ने कार्रवाई कर करीब 16 क्विंटल गोंद जब्त किया। जांच में खुलासा हुआ कि यह गोंद प्राकृतिक तरीके से नहीं, बल्कि केमिकल इंजेक्शन के जरिये निकाला गया है। कारोबारियों की यह शार्टकट तकनीक न केवल पेड़ों के लिए खतरनाक है, बल्कि मनुष्यों की सेहत भी बिगड़ रही है। वहीं पर्यावरण के लिए भी बड़ा खतरा बनती जा रही है।
प्राकृतिक तरीके से निकला गोंद आयुर्वेदिक दवाओं, मिठाइयों, बेकरी उत्पादों और च्युइंग गम तक में इस्तेमाल होता है। इसके अलावा गोंद का उपयोग स्याही, पेपर गम, फर्नीचर पालिश और सौंदर्य प्रसाधनों में भी किया जाता है, लेकिन केमिकल इंजेक्शन से निकला गोंद अपनी गुणवत्ता खो देता है। इसमें रसायनों की मिलावट स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो रही है। लंबे समय तक इसके सेवन से पेट और लिवर से जुड़ी समस्याएं बढ़ने का खतरा रहता है। यहां तक कि वजन भी तेजी से घटता है। उधर अब वन विभाग ने ऐसे माफियाओं पर सख्त कार्रवाई की तैयारी की है।
पूर्व पीसीसीएफ व पर्यावरणविद् डॉ. पीसी दुबे बताते हैं कि गोंद पेड़ों की रक्षा प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा है। किटाणुओं व वायरस से भी लड़ता है। प्राकृतिक तरीके से गोंद निकालने की पेड़ की अपनी क्षमता रहती है। रसायन वाले इंजेक्शन लगाने से पेड़ों की आयु कम होती है, जो आठ से दस साल में नष्ट हो जाती है। सिलाई गोंद आयुर्वेदिक दवाओं में इस्तेमाल किया जाता है। इन दिनों कैंसर की दवाइयों में भी सिलाई गोंद का उपयोग हो रहा है, जबकि धावड़ गोंद सबसे ज्यादा पोषक होता है। वैसे रसायन शरीर में जाते ही सेहत खराब करते हैं।
गोंद निकालने वाले ग्रामीणों ने बताया कि व्यापारी उन्हें छोटी-छोटी शीशियों में केमिकल देते हैं। पेड़ों के तनों में छेद कर यह रसायन या तो सीधे डाला जाता है या फिर इंजेक्शन से चढ़ाया जाता है। दो-तीन दिन में पेड़ से गोंद बड़ी मात्रा में बहने लगता है। जहां एक श्रमिक सामान्य प्रक्रिया से रोजाना केवल 250 ग्राम गोंद निकाल पाता है, वहीं इस रसायनिक तरीके से उसे एक किलो तक गोंद मिल जाता है। यही वजह है कि माफिया तेजी से मुनाफा कमा रहे हैं।
अप्रैल में इंदौर वन ने तीन कार्रवाई की। पूछताछ में गिरोह चोरल, बड़वानी और खंडवा के जंगलों में सक्रिय है। यहां से गोंद इकट्ठा कर इंदौर की मंडियों में पहुंचाया जाता है, जिसमें छावनी, सियागंज और मारोठिया में सप्लाई होता है। इस अवैध कारोबार से न केवल जंगल उजड़ रहे हैं, बल्कि सरकार को भी करोड़ों का राजस्व नुकसान हो रहा है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि धावड़ा और साल जैसे पेड़ों की छाल को हल्का काटने पर धीरे-धीरे राल (गोंद) निकलती है। यह सूखकर गोंद का रूप लेती है, जिसे सावधानीपूर्वक इकट्ठा किया जाता है। यह तरीका पेड़ों को नुकसान नहीं पहुंचाता और गोंद भी शुद्ध रहता है।
मंडियों में बड़ी मात्रा में रसायनयुक्त गोंद पहुंच रहा है। अब व्यापारियों के गोदाम में गोंद का स्टाक जांचा जाएगा। यहां तक कि गोंद की गुणवत्ता की जांच करवाने पर विचार किया जा रहा है। वहीं रसायन बेचने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई की तैयारी चल रही है। -प्रदीप मिश्रा, डीएफओ, इंदौर वनमंडल