विश्व शरणार्थी दिवस: देश के विभाजन के बाद सिंध से आए और मालवा-निमाड़ की पहचान बन गए
देश विभाजन की त्रासदी ने लाखों लोगों को अपनी जन्मभूमि छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया था। इनमें बड़ी संख्या सिंधी समाज की थी, जो पाकिस्तान के सिंध प्रांत ...और पढ़ें
Publish Date: Sat, 20 Jun 2026 02:10:00 PM (IST)Updated Date: Sat, 20 Jun 2026 02:10:00 PM (IST)
इंदौर में रहते हैं कई शरणार्थी। (नईदुनिया)HighLights
- विभाजन के बाद पहुंचे परिवार आज व्यापार, उद्योग, शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में निभा रहे महत्वपूर्ण भूमिका
- इनमें बड़ी संख्या सिंधी समाज की थी, जो पाकिस्तान के सिंध प्रांत से विस्थापित होकर भारत आया
- मालवा-निमाड़ के शहरों में बसे ऐसे परिवारों की यात्रा संघर्ष से सफलता तक की कहानी बयां करती है
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। देश विभाजन की त्रासदी ने लाखों लोगों को अपनी जन्मभूमि छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया था। इनमें बड़ी संख्या सिंधी समाज की थी, जो पाकिस्तान के सिंध प्रांत से विस्थापित होकर भारत आया। विश्व शरणार्थी दिवस पर मालवा-निमाड़ के शहरों में बसे ऐसे परिवारों की यात्रा संघर्ष से सफलता तक की कहानी बयां करती है।
इंदौर में विभाजन के बाद आए सिंधी परिवारों ने सियागंज के किराना व्यापार, जेल रोड के कास्मेटिक बाजार, रेडीमेड वस्त्र व्यवसाय और अन्य व्यापारिक गतिविधियों में अपनी मजबूत पहचान बनाई। सिंधी कालोनी, प्रेम नगर, खातीवाला टैंक, पैलेस कालोनी और त्रिवेणी कालोनी जैसे क्षेत्रों में समाज की बड़ी आबादी निवास करती है।
समाज के वरिष्ठजन का कहना है कि खाली हाथ आने वाले अनेक परिवारों ने अपनी मेहनत और उद्यमशीलता से नई पहचान बनाई। समाजजन आर्थिक गतिविधियों के साथ सिंधी भाषा, चेटीचंड, झूलेलाल जयंती और सांस्कृतिक परंपराओं को भी नई पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं।
बुरहानपुर : पुनर्वास से प्रतिष्ठा तक का सफर
बुरहानपुर में करीब 14,500 सिंधी समाजजन और 2,000 से अधिक परिवार निवास करते हैं। सिंधी बस्ती, माना कैंप, मेघन कैंप, कटनी कैंप, इटवारा, इंदिरा नगर और लालबाग क्षेत्रों में समाज की उल्लेखनीय उपस्थिति है। व्यापार, उद्योग और सामाजिक गतिविधियों में समाज की सक्रिय भागीदारी रही है।
रतलाम : व्यापारिक पहचान की मजबूत नींव
विभाजन के बाद रतलाम पहुंचे सिंधी परिवारों ने व्यापार और लघु उद्योगों के माध्यम से अपनी अलग पहचान बनाई। समय के साथ नई पीढ़ी शिक्षा, पेशेवर सेवाओं और उद्यमिता के क्षेत्र में आगे बढ़ी है। शहर के सामाजिक और आर्थिक विकास में समाज का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
विरासत भी बची, पहचान भी
सिंधी समाज के लिए विभाजन केवल भौगोलिक विस्थापन नहीं था, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से बिछड़ने की पीड़ा भी थी। इसके बावजूद समाज ने अपनी भाषा, संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और सामाजिक मूल्यों को संरक्षित रखा। आज चेटीचंड, झूलेलाल जयंती और अन्य सांस्कृतिक आयोजन नई पीढ़ी को अपनी विरासत से जोड़ रहे हैं।
एक नजर में
- 1947 के विभाजन के बाद बड़ी संख्या में सिंधी परिवार भारत आए
- इंदौर, रतलाम और बुरहानपुर में मजबूत सामाजिक उपस्थिति
- व्यापार, उद्योग और सेवा क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान
- सिंधी भाषा और संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के प्रयास
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