
इटारसी(ब्यूरो)। नशे की लत प्लेटफार्म व आसपास रहने वाले घुमक्कड़ परिवारों में रहने वाले बच्चों की जिंदगी बर्बाद कर रही है। तेजी से ये बच्चे व्हाइटनर से मिलने वाले नशे की गिरफ्त में आ रहे हैं। ये बच्चे ये नशा खुलेआम व जिम्मेदारों की आंखों के सामने करने से भी नहीं चूकते। बेरोकटोक बच्चे व युवा व्हाटनर के नशे के आदि हो रहे हैं, लेकिन इन्हें सही रास्ते पर नहीं लाया जा रहा है। ये स्थिति इस शहर में तब है जबकि शहर में नशा मुक्ति के एनजीओ भी कार्यरत हैं, लेकिन किसी ने अब तक सफलता नहीं पाई है। शुरुआत में ये एनजीओ जरूर ठीक से काम करते हैं, लेकिन जैसे ही सरकारी पैसों की आवक शुरु होती है, इनका काम जमीन पर धीमा और कागजों में तेज हो जाता है। शहर में कुछ एनजीओ ऐसे हैं जिन्होंने शुरुआत तो नशा मुक्ति से की थी, लेकिन अब ये बाल आश्रम बनकर रह गए हैं।
सोमवार को स्टेशन पर फुट ओव्हर ब्रिज के नीचे तीन युवा नशे की हालत में घूम रहे थे। प्रतिदिन ये इसी समय स्टेशन पर घूमते हैं। इनके हाथ में रोजाना की तरह गंदे से कपड़े में लपटी 15 मिलीलीटर की व्हाइटनर की बोतल थी। जिसे वे अपने मुंह में लगाए हुए थे। तीनों की आंखें लाल हो चुकी थी। जब कैमरा देखा तो लड़खड़ाती जुबान में फोटो खींचने से मना करने लगे। कैमरा बंद किया जब इन लोगों ने बातचीत की। एक युवक ने अपना नाम राकेश (परिवर्तिनाम नाम) बताया, उसका कहना था कि वह ट्रेनों में साफ-सफाई का काम करता है और स्टेशन के पास ही रहता है। उसके साथी ने बताया कि प्रतिदिन करीब 3 शीशियां उन्हें लगती है। वे इसके लिए ही कमाते हैं, चाहे रोटी मिले या न मिले, लेकिन व्हाइटनर तो चाहिए ही होता है। उनका कहना था कि उन्हें बिना किसी रोकटोक के व्हाइटनर मिल जाता है और उन्हें पीने से भी कोई नहीं रोकता। ये स्थिति इस शहर में तब है जबकि शहर में कई एनजीओ नशा मुक्ति के नाम पर अपनी दुकानें चमका रहे हैं।
तीन शीशी प्रतिदिन
बच्चे व्हाइटनर के नशे के इतने आदी हो चुके हैं कि उनको एक दिन में तीन शीशी लग जाती हैं। दिनभर में कचरा बीनकर या फिर चोरी करके सौ-दो सौ रुपए कमाने होते हैं। रात में सोते वक्त भी व्हाइटनर लगा कपड़ा मुंह के पास ही रखते हैं। नशे की हालत में चूर बच्चों व युवाओं ने बताया कि शराब से ज्यादा नशा व्हाइटनर में आता है, वहीं शराब महंगी भी होती है।
जान की भी नहीं परवाह
स्टेशनों पर घूमने वाले व ट्रेनों में खासतौर पर सफाई कार्य, मूंग फल्ली, पेपर शोप बेंचकर पैसे कमाने वाले बच्चों को जान की भी परवाह नहीं हे। ये चलती ट्रेनों में चढ जाते हैं और ऐसे ही उतर जाते हैं। स्टेशन पर प्लेटफार्म के बीच में मीललाइन पर बैठकर ये नशा करते हैं।
बाक्सः
स्टेशनरी की दुकान पर नशा
शहर में स्टेशनरी की दुकान पर बच्चों के जीवन से खेलता नशा आसानी से उपलब्ध हो रहा है। दुकानदार भी बिना पूछताछ के बच्चों को व्हाइटनर बेच देते हैं। खासतौर पर स्टेशन के आसपास रहने वाले बच्चे, झुग्गियों में रहने वाले बच्चों को नशे की ये शीशियां बेंची जा रही है। चंद के पैसों की लालच में स्टेशनरी संचालक बच्चों को नशा बेंच रहे हैं। जबकि कई बार पुलिस विभाग स्टेशनरी संचालकों को कह चुका है कि वे इस तरह के बच्चों व युवाओं को व्हाइटनर न बेंचे। लेकिन ये जानबूझकर हो रहा है, क्योंकि जो बच्चे या युवा इसका सेवन करते हैं उनका हुलिया पहचानकर कोई भी उन्हें पहचान सकता है।
इनका कहना है
हम प्लेटफार्म से ऐसे बच्चों व युवाओं को चिन्हित कर उन्हें नशा मुक्ति के लिए संस्थानों में नियमानुसार भेंजेगे और उन्हें स्टेशन पर अवैध रूप से कार्य करने से रोककर उन्हें अच्छे कार्य में लगाने का प्रयास करेंगे।
एस कौरव, थाना प्रभारी, जीआरपी, इटारसी
खबर के साथ फोटो--- 10 आईटी 01
इटारसी। रेलवे स्टेशन पर प्लेटफार्म नम्बर 1 व 2 के बीच में बैठकर व्हाइटनर पीता युवक।
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