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एमपी के इस जिले में है विश्व का इकलौता शिवलिंग, जहां दूध-जल नहीं सिंदूर से होता है अभिषेक

क्या आप जानते हैं MP में एक ऐसा अनोखा शिवालय है, जहां जल या दूध नहीं बल्कि सिंदूर से होता है शिव का अभिषेक? जानिए भस्मासुर की पौराणिक कथा से जुड़े इस रहस्यमयी धाम का पूरा सच!

By ADITYA KUMAREdited By: ADITYA KUMAR
Publish Date: Tue, 28 Jul 2026 04:24:44 PM (IST)Updated Date: Tue, 28 Jul 2026 04:24:44 PM (IST)
एमपी के इस जिले में है विश्व का इकलौता शिवलिंग, जहां दूध-जल नहीं सिंदूर से होता है अभिषेक
'तिलक सिंदूर' (ये तस्वीर एआई की मदद से बनाई गई है)

HighLights

  1. विश्व का इकलौता शिवालय, जहां दूध नहीं सिंदूर से होता है अभिषेक
  2. सतपुड़ा के घने जंगलों में स्थित है तिलक सिंदूर का पौराणिक धाम
  3. भस्मासुर से बचने के लिए इसी क्षेत्र में छिपे थे भगवान भोलेनाथ

क्या आप जानते हैं कि मध्य प्रदेश के एक ऐसे दिव्य धाम के बारे में, जहां भगवान शिव का जल या दूध से नहीं, बल्कि सिंदूर से अभिषेक किया जाता है?

जी हां, सतपुड़ा की हरी-भरी और सुरम्य वादियों में स्थित 'तिलक सिंदूर' विश्व का इकलौता ऐसा शिवालय है, जहां शिवलिंग पर सिंदूर चढ़ाने की अनूठी परंपरा है। यह अलौकिक धाम नर्मदापुरम (होशंगाबाद) जिले के इटारसी शहर से महज 16 किलोमीटर की दूरी पर घने जंगलों के बीच स्थित है।

आदिवासी संस्कृति और 'बड़े देव' की महिमा

तिलक सिंदूर मंदिर का ऐतिहासिक और आध्यात्मिक संबंध गोंड जनजाति से गहराई से जुड़ा हुआ है। आदिवासी समुदाय में पूजा-पाठ के दौरान सिंदूर का विशेष महत्व होता है। गोंड समाज के लोग भगवान भोलेनाथ को 'बड़े देव' के रूप में पूजते हैं।


इतिहास के अनुसार, सतपुड़ा की पहाड़ियों पर पचमढ़ी से लेकर हरदा और टिमरनी तक गोंड राजाओं का शासन था। इन राजाओं ने ही यहां विशाल शिवलिंग की स्थापना की थी। प्राचीन परंपरा का पालन करते हुए आज भी इस मंदिर में पहली पूजा का अधिकार आदिवासी समाज के प्रधान यानी 'भौमका' परिवार को ही प्राप्त है।

भस्मासुर की पौराणिक कथा और भवानी अष्टक का संबंध

इस पवित्र स्थल से कई पौराणिक मान्यताएं भी जुड़ी हैं। कहा जाता है कि जब भस्मासुर से बचने के लिए भगवान शिव भाग रहे थे, तब वे इसी क्षेत्र की गुफाओं और कंदराओं में छिपे थे। यहाँ से वे पचमढ़ी के पास स्थित जम्बूद्वीप गुफा की ओर निकले थे।

नेपाल सीमा से आए प्रसिद्ध साधक कालिकानंद ब्रह्मचारी (जिन्हें स्थानीय लोग 'बम बम बाबा' कहते थे) ने यहां वर्षों तांत्रिक साधना की थी। उनका मानना था कि धार्मिक ग्रंथ 'भवानी अष्टक' में जिस 'तिलक वन' का उल्लेख मिलता है, वह वास्तव में यही तिलक सिंदूर धाम है।

श्मशान के बीच विराजे हैं भोलेनाथ

इस धाम की एक और अनूठी विशेषता यह है कि जिस स्थान पर भगवान भोलेनाथ का विशाल शिवलिंग विराजित है, वहां आसपास के 15 आदिवासी गांवों का श्मशान घाट भी है। मंदिर के पास ही कल-कल बहती हंसगंगा नदी इसके वातावरण को और भी भक्तिमय बना देती है। महाशिवरात्रि पर यहां विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें हर साल 3 लाख से अधिक श्रद्धालु बाबा के दर्शन करने पहुंचते हैं।

कैसे पहुंचें तिलक सिंदूर धाम?

यदि आप इस अद्भुत मंदिर के दर्शन करना चाहते हैं, तो इटारसी से धरमकुंडी मार्ग पर 12 किलोमीटर दूर स्थित जमानी गांव पहुंचें। यहां से दक्षिण दिशा में सतपुड़ा के घने जंगलों के बीच 8 किलोमीटर का मार्ग तय करके आप इस पावन धाम तक पहुंच सकते हैं।

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