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27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण की वैधता पर सुनवाई में नया मोड़, हाई कोर्ट में सरकार की दलील पर उठे सवाल

ओबीसी पक्ष ने हाई कोर्ट में सवाल उठाया कि यदि कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक हुआ तो इसका पूरा जिम्मा 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण पर कैसे डाला जा सकता है। प...और पढ़ें

By Surendra DubeyEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Fri, 31 Jul 2026 09:31:43 PM (IST)Updated Date: Fri, 31 Jul 2026 09:34:49 PM (IST)
27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण की वैधता पर सुनवाई में नया मोड़, हाई कोर्ट में सरकार की दलील पर उठे सवाल
27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण

HighLights

  1. 50 प्रतिशत की सीमा ओबीसी ने तोड़ी या ईडब्ल्यूएस ने
  2. -ओबीसी पक्ष ने कहा- ईडब्ल्यूएस पहले लागू हुआ
  3. फिर पूरी सीमा टूटने का दोष ओबीसी पर क्यों

नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। मध्य प्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण की संवैधानिक वैधता पर चल रही सुनवाई में शुक्रवार को 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा को लेकर बहस ने नया मोड़ ले लिया।

ओबीसी पक्ष ने हाई कोर्ट में सवाल उठाया कि यदि कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक हुआ तो इसका पूरा जिम्मा 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण पर कैसे डाला जा सकता है।

पक्ष ने तर्क दिया कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण पहले लागू हो चुका था और उसके बाद ओबीसी आरक्षण का कानून प्रभावी हुआ।

प्रशासनिक न्यायाधीश आनंद पाठक व न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ में हुई सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता केएम नटराजन ने अपनी दलीलें पूरी कीं। इसके बाद ओबीसी आरक्षण के समर्थन में अधिवक्ता शशांक रत्नू ने पक्ष रखा।

पुराने आंकड़ों पर भी घिरी सरकार की दलील

सरकार ने बताया कि ओबीसी आरक्षण बढ़ाने की कवायद 2019 से काफी पहले शुरू हो गई थी। 1999 - 2000 की पिछड़ा वर्ग आयोग की वार्षिक रिपोर्ट के आधार पर 2001 में आरक्षण बढ़ाने की अनुशंसा हुई थी।

2003 में सरकार ने ओबीसी आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का प्रस्ताव किया और अध्यादेश भी मंजूर किया था। हालांकि प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।

सुनवाई में यह तथ्य भी सामने आया कि इन प्रयासों का प्रमुख आधार 1982 की महाजन आयोग रिपोर्ट रही।

ओबीसी पक्ष ने सवाल उठाया कि यदि 2019 में नया क्वांटिफिएबल डेटा उपलब्ध था तो सरकार अब डेटा जुटाने के लिए समय की जरूरत क्यों बता रही है।

ईडब्ल्यूएस के समय को बनाया आधार

शशांक रत्नू ने कहा कि ओबीसी आरक्षण का अध्यादेश मार्च 2019 में आया, जबकि कानून अगस्त 2019 में लागू हुआ। इसके विपरीत ईडब्ल्यूएस आरक्षण इससे पहले लागू हो चुका था। ऐसे में 50 प्रतिशत की सीमा पार होने के लिए केवल ओबीसी आरक्षण को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।


उन्होंने महाजन आयोग की रिपोर्ट का बचाव करते हुए कहा कि मध्य प्रदेश की सामाजिक संरचना अन्य राज्यों से अलग है। इसी आधार पर 27 प्रतिशत आरक्षण का समर्थन किया गया।

87-13 फार्मूले पर बाद में सुनवाई

सुनवाई के दौरान भर्ती के 87-13 प्रतिशत फार्मूले को भी चुनौती दी गई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पहले 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण की संवैधानिक वैधता पर सभी पक्षों की बहस पूरी होगी। इसके बाद 87-13 प्रतिशत फार्मूले पर सुनवाई की जाएगी। ओबीसी पक्ष ने अपनी बहस पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा। अब मामले की अगली सुनवाई तीन अगस्त को दोपहर 2.30 बजे होगी।