
जबलपुर। प्लेटफार्म की पटरियों में गंदगी रोकने के लिए रेल बोर्ड ने कई कदम उठाए, लेकिन यात्रियों की लापरवाही और अनदेखी से सफल नहीं हो सके। लिहाजा गंदगी को खत्म करने के लिए बोगियों के टॉयलेट में बदलाव किया गया। कोचों में वर्तमान बॉशरूम को हटाकर बॉयो टॉयलेट लगाए जाने हैं, जो सफल भी हो रहा है,पर इनकी लागत और रखरखाव रेलवे को महंगा पड़ रहा है। पिछले 6 माह में जबलपुर मंडल ने महज 70 बोगियों में ही बॉयो टायलेट लगाए हैं।
5 से 7 लाख तक का खर्च
पश्चिम मध्य रेलवे ने जबलपुर समेत भोपाल और कोटा डिविजन के सभी कोचों में बॉयो टायलेट लगाने के निर्देश दिए हैं, मगर बजट और लगाने की लंबी प्रक्रिया इस काम में आड़े आ रही है। एक बॉयो टायलेट की कीमत तकरीबन 5 से 8 लाख रुपए के बीच आ रही है। इस कीमत से इन्हें लगाने की रफ्तार धीमी है। जबलपुर डिवीजन में ही अभी तकरीबन 550 कोचों में इन्हें लगाया जाना है।
रेलवे वर्कशॉप में ही लग सकता है
- कोच में बॉयो टायलेट फिट करने की प्रक्रिया लम्बी व खर्चीली है।
- इसे पमरे के भोपाल स्थित सीआरडब्ल्यूएस में ही लगाया जाता है।
- इसके अलावा अजमेर और हुबली रेल वर्क शॉप में लगते हैं।
- जबलपुर वर्कशॉप में इन्हें लगाना मुश्किल है।
- इसे लगाते समय कोच को पूरी तरह से झुकाना होता है।
कैसे काम करना है
ये टायलेट पूरी तरह से बॉयो सिस्टम पर काम करता है। टायलेट सीट से गंदगी पटरी पर नहीं गिरती, बल्कि कोच के नीचे बने एक कंटेन में जाती है। इसमें मौजूद पानी में क्लोरिन और कई बॉयो कैमिकल होते हैें, जिसमें मौजूद बैक्टीरिया गंदगी को पानी में बदला देता है। हालांकि इस पानी का उपयोग रेलवे अन्य किसी काम में नहीं लाता। टायलेट में ही एक क्लिच होता है, जिसे नीचे दबाने पर यह पानी कंटेन के बाहर निकल जाता है।
रेलवे को फायदा
- प्लेटफार्म पर खड़ी ट्रेन से गंदगी पटरी पर नहीं गिरती।
- सफाई कर्मचारी को किसी तरह की गंदगी नहीं उठानी पड़ती।
- कंटेन का पानी पटरी पर छोड़ने से मौजूद गंदगी भी साफ हो जाती है।
- कोच में स्वच्छता बनी रहती है।
फिर भी रेलवे परेशान
- इतनी महंगी लागत से बॉयो टायलेट लगाने के बाद भी यात्री इसे नुकसान पहुंचाते हैं।
- डस्टबिन होने के बाद भी सीट में ही खाने की पन्नी या कागज छोड़ते हैं।
- क्लिच को नही दबाते।
- सूचना पटल में लगी जानकारी को फाड़ देते हैं।
अब ये कर रहे
- बॉयो टायलेट के साथ जानकारी देने के लिए माउथ सिस्टम लगा रहे।
- दरवाजा बंद करते ही रिकार्डिंग शुरू हो जाती है।
- यह बताया कि टायलेट का उपयोग कैसे करना है।
वर्जन- पश्चिम मध्य रेलवे अपने तीनों डिवीजन के कोचों में बॉयो टायलेट लगा रहा है। इसे लगाने की प्रक्रिया लंबी है, इसलिए कोच वर्कशॉप में जाने के बाद ही लगता है। हालांकि अब नए कोचों में यह सिस्टम लग कर ही आ रहे हैं।
पीयूष माथुर, पीआरओ, पमरे