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सरकारी वकील के बजाय निजी अधिवक्ता से याचिका, MP हाई कोर्ट की फटकार के बाद डीएफओ-रेंजर पर होगी विभागीय जांच

मामला सतना की वन समितियों में कार्यरत 25 मजदूरों के न्यूनतम वेतनमान से जुड़ा है। कोर्ट ने 30 दिन में कार्रवाई रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं।

By Surendra DubeyEdited By: Prashant Pandey
Publish Date: Wed, 23 Sep 2026 01:46:39 PM (IST)Updated Date: Wed, 23 Sep 2026 01:53:19 PM (IST)
सरकारी वकील के बजाय निजी अधिवक्ता से याचिका, MP हाई कोर्ट की फटकार के बाद डीएफओ-रेंजर पर होगी विभागीय जांच
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में प्रिंसिपल चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट ने दिया कार्रवाई का भरोसा। - प्रतीकात्मक तस्वीर

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने 22 सितंबर 2022 को मजदूरों को न्यूनतम वेतनमान देने का आदेश दिया था
  2. इसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका में निजी अधिवक्ता की सेवाएं लेने पर कोर्ट ने आपत्ति जताई
  3. सुनवाई में यह भी सामने आया कि रेंजर को सेवानिवृत्ति से पहले निंदा जैसी हल्की सजा दी गई

नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। सरकारी वकील के बजाय निजी अधिवक्ता से पुनर्विचार याचिका दाखिल कराने के मामले में मप्र हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की बेंच के समक्ष सुनवाई के दौरान प्रिंसिपल चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट (पीसीसीएफ) शुभ रंजन सेन व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए। उन्होंने भरोसा दिलाया कि सतना के संबंधित डीएफओ और रेंजर की भूमिका की विभागीय जांच कराकर कार्रवाई की जाएगी।

कोर्ट ने 30 दिन में कार्रवाई रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। अगली सुनवाई 28 अक्टूबर को होगी। मामला सतना की वन समितियों में कार्यरत 25 मजदूरों के न्यूनतम वेतनमान से जुड़ा है। हाई कोर्ट ने 22 सितंबर 2022 को मजदूरों को न्यूनतम वेतनमान देने का आदेश दिया था।


इसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका में निजी अधिवक्ता की सेवाएं लेने पर कोर्ट ने आपत्ति जताई। सुनवाई में यह भी सामने आया कि रेंजर को सेवानिवृत्ति से पहले निंदा जैसी हल्की सजा दी गई, जबकि तत्कालीन डीएफओ पर कार्रवाई नहीं हुई। कोर्ट ने मनमानी पर रोक की जरूरत बताई। पीसीसीएफ ने दोनों अधिकारियों की जांच का आश्वासन दिया।

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