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फतवे के आधार पर तलाक नहीं, कानूनी प्रक्रिया जरूरी, एमपी हाई कोर्ट का अहम आदेश

कोर्ट ने पाया कि उसमें निकाह खत्म करने की घोषणा नहीं, बल्कि इस्लामी ग्रंथों के आधार पर पत्नी की कथित क्रूरता जैसी परिस्थितियों पर धार्मिक मार्गदर्शन द...और पढ़ें

By Surendra DubeyEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Thu, 06 Aug 2026 08:35:04 PM (IST)Updated Date: Thu, 06 Aug 2026 08:40:00 PM (IST)
फतवे के आधार पर तलाक नहीं, कानूनी प्रक्रिया जरूरी, एमपी हाई कोर्ट का अहम आदेश
मध्‍य प्रदेश हाई कोर्ट।

HighLights

  1. यह मामला भोपाल की दारुल-दफ़ा मसाजिद कमेटी के फतवे से जुड़ा था।
  2. पति चाहता था कि फतवे के आधार पर उसका निकाह खत्म मान लिया जाए।
  3. जबकि पत्नी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि फतवा कानूनी तलाक नहीं है।

नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकलपीठ ने मुस्लिम विवाह-विच्छेद से जुड़े अहम मामले में स्पष्ट किया है कि केवल फतवे के आधार पर निकाह खत्म नहीं माना जा सकता।

धार्मिक संस्था या मसाजिद कमेटी धार्मिक राय दे सकती है, लेकिन कानूनी रूप से विवाह समाप्त करने का अधिकार सक्षम अदालत के पास है।

दरअसल, यह मामला भोपाल की दारुल-दफ़ा मसाजिद कमेटी के फतवे से जुड़ा था। पति चाहता था कि फतवे के आधार पर उसका निकाह खत्म मान लिया जाए, जबकि पत्नी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि फतवा कानूनी तलाक नहीं है। मामला हाई कोर्ट पहुंचा। हाई कोर्ट ने फतवे का अध्ययन किया।

कोर्ट ने पाया कि उसमें निकाह खत्म करने की घोषणा नहीं, बल्कि इस्लामी ग्रंथों के आधार पर पत्नी की कथित क्रूरता जैसी परिस्थितियों पर धार्मिक मार्गदर्शन दिया गया था। इसलिए इसे कानूनी तलाक नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई मदरसा, धार्मिक शिक्षण संस्था या मसाजिद कमेटी मुस्लिम पुरुष को कानूनी तलाक नहीं दे सकती। पति चाहे तो पारिवारिक न्यायालय में तलाक की याचिका दाखिल कर सकता है।

मुस्लिम विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1939 भी उसे ऐसा करने से नहीं रोकता। हाई कोर्ट ने दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश सात नियम 11 के तहत मौजूदा वाद खारिज करते हुए नई तलाक याचिका दाखिल करने की स्वतंत्रता दी।