Jabalpur News : सुरेंद्र दुबे,जबलपुर नई दुनिया। भारतीय संस्कृति में शब्द को ब्रह्म कहा गया है और ब्रह्म की अभिव्यक्ति शब्द से ही संभव है। इसी भाव को अंगीकार कर रचनात्मक लेखन के क्षेत्र में जुटा हुआ हूं। ये शब्द हैं जबलपुर निवासी युवा रचनाकार सिद्धार्थ शंकर श्रीवास्तव के, जिन्होंने ओशो पर आधारित नाटक ‘रजनीश राजा चंद्रमोहन‘ के जरिए देश-दुनिया में सराहना हासिल कर ली है। इस नाटक का प्रथम मंचन संस्कारधानी में ओशो महोत्सव के दौरान तरंग प्रेक्षागृह में हुआ था। कालांतर में देश के दूसरे शहरों के साथ-साथ काठमांडू तक इसकी धूम मची।
सिद्धार्थ बताते हैं कि वे ओशो के विधिवत दीक्षित संन्यासी हैं। उनका संन्यस्त नाम स्वामी देव सिद्धार्थ है। यही वजह है कि ओशो को न केवल पढ़ा और सुना बल्कि उनकी देशना के गहराई से जीवन में उतारा भी। ओशो प्रणीत ध्यान-साधना से जाे आनंद प्राप्त हुआ, उसी ने सद्गुरु ओशो पर आधारित विश्व का प्रथम नाटक रचने की प्रेरणा दी। विचार स्वतंत्र होते हैं जबकि तथ्य पवित्र, इसी सिद्धांत को आधार बनाकर रजनीश राजा चंद्रमोहन शीर्षक नाटक मेें मूलभूत घटनाओं को पूरी शुचिता के साथ प्रस्तुत किया गया। इसी प्रामाणिकता ने सुधि रंग प्रेमियों के बीच लोकप्रिय बना दिया।
जबलपुर में जन्मे सिद्धार्थ को बचपन से ही अभिनय का शौक रहा। उन्होंने महज आठ वर्ष की अल्पायु में रामलीला में पात्र अभिनीत करना शुरू कर दिया था। इसके बाद स्कूल में ड्रामा सहित अन्य शैक्षणेत्तर गतिविधियों में प्रतिभागी होकर वाह वाही हासिल करने लगे। आगे चलकर रंगमंच से जुड़ गए। इसी बीच कविताओं की रचना होने लगी। उनकी कई कविताएं प्रकाशित हुईं और कई का उन्हाेंने मंचों पर पाठ भी किया। इससे उनके व्यक्तित्व का बहुआयामी विकास होने लगा। प्रेम पर कविताएं रचते-रचते उन्हें प्रेम हुआ और 20 वर्ष की आयु में उमा नायक के साथ प्रेम विवाह के सूत्र में आबद्ध हो गए। साथ ही एक बेटी के पिता बन गए। इसी के साथ आजीविका के लिए आइटी कंपनी में सेवा देने लगे।
सिद्धार्थ बताते हैं कि वे दसवीं कक्षा में अनुत्तीर्ण होने के बाद जबलपुर से मुंबई भाग गए थे। वहां उस्तादों की छत्रछाया में लघु फिल्म बनाने की कला सीखी। इसके बाद बड़े बाबू शीर्षक एक लघु फिल्म का निर्माण किया, जिसे प्रदेश की बेस्ट फिल्म का अवार्ड मिला। साथ ही बेस्ट स्क्रिप्ट राइटर का खिताब भी हासिल हुआ। सबसे खास बात यह कि कभी भी अपने सपनों व कलागत अभिरुचि के सिलसिले में परिवार को संघर्ष या पीड़ा का सामना नहीं करने दिया। पारिवारिक आवश्यकताओं की प्रतिपूर्ति के समानांतर कला क्षेत्र में प्रगति करने का मध्य-मार्ग निकाला। एक महत्वपूर्ण बात यह कि पत्नी के साथ बाइक पर सात हजार किलोमीटर की यात्रा पूरी कर केदारनाथ धाम तक पहुंचने का भी कीर्तिमान बनाया।