
सुरेन्द्र दुबे, नईदुनिया जबलपुर। प्रदेश की न्यायपालिका का ताजा हरित संदेश सराहनीय है। सरकारी वाहनों के उपयोग पर अनुशासन की लगाम कसते हुए वकीलों से वर्चुअल पैरवी की अपील की गई है। रोजाना ईंधन खपत की निगरानी वाकई अच्छा कदम है।
दरअसल, न्यायालयों के गलियारों में प्रायः संविधान, कानून और न्याय की गूंज सुनाई देती है, लेकिन इस बार मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक ऐसे विषय को केंद्र में रखा है जो सीधे राष्ट्र की ऊर्जा सुरक्षा और संसाधन संरक्षण से जुड़ा है।
अदालत ने अपने प्रशासनिक अधिकारों का उपयोग करते हुए एक ऐसा संदेश दिया है, जो न्यायपालिका की चौहद्दी से निकलकर व्यापक सामाजिक जिम्मेदारी का रूप ले सकता है, ईंधन बचाइए, संसाधनों का सम्मान कीजिए।
हाई कोर्ट कार्यवाहक मुख्य न्यायमूर्ति विवेक रूसिया के आदेश पर जारी नई एडवाइजरी में हाई कोर्ट की मुख्य पीठ जबलपुर, इंदौर और ग्वालियर खंडपीठों के साथ प्रदेश की सभी जिला अदालतों को ईंधन संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने को कहा गया है। यह पहल केवल खर्च कम करने की कवायद नहीं, बल्कि बदलते समय के अनुरूप न्यायिक व्यवस्था को अधिक जिम्मेदार और तकनीक-सक्षम बनाने का प्रयास भी है।
नई व्यवस्था के तहत सरकारी वाहनों का उपयोग अब अधिक अनुशासित और आवश्यकता-आधारित होगा। अधिकारियों एवं कर्मचारियों के निवास क्षेत्रों के अनुसार रूट निर्धारित किए जाएंगे और वाहनों की अधिकतम क्षमता का उपयोग सुनिश्चित किया जाएगा।
व्यक्तिगत वाहन सुविधा केवल सुरक्षा, प्रोटोकाल, चिकित्सा अथवा अन्य विशेष परिस्थितियों तक सीमित रहेगी। यह व्यवस्था बताती है कि अदालतें अब संसाधनों के उपयोग को भी प्रशासनिक दक्षता के पैमाने पर कसना चाहती हैं।
गाइडलाइन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष अधिवक्ताओं से जुड़ा है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट आग्रह किया है कि जहां भी संभव हो, मामलों की सुनवाई और पैरवी वीडियो कान्फ्रेंसिंग के माध्यम से की जाए। संदेश यह है कि न्याय तक पहुंच का रास्ता हमेशा सड़कों से होकर ही नहीं गुजरता, कभी-कभी वह डिजिटल स्क्रीन पर भी उतनी ही प्रभावी ढंग से तय किया जा सकता है।
प्रशासनिक बैठकों और आधिकारिक संवाद को भी वर्चुअल माध्यमों से संचालित करने पर बल दिया गया है, ताकि अनावश्यक आवागमन कम हो और ईंधन की बचत सुनिश्चित की जा सके।
अधिवक्ताओं, न्यायिक अधिकारियों और कर्मचारियों से कार-पूलिंग, टू-व्हीलर पूलिंग तथा सार्वजनिक परिवहन का अधिकाधिक उपयोग करने का अनुरोध किया गया है। आवश्यकता पड़ने पर साझा परिवहन सुविधाएं विकसित करने का भी सुझाव दिया गया है।
यह केवल एक प्रशासनिक निर्देश नहीं, बल्कि न्यायपालिका की ओर से दिया गया एक हरित संदेश है कि राष्ट्रीय संसाधनों की रक्षा केवल सरकार का नहीं, प्रत्येक संस्थान और नागरिक का दायित्व है।
हाईकोर्ट ने वाहनों के उपयोग और ईंधन खपत की दैनिक मानिटरिंग के निर्देश दिए हैं। समय-समय पर समीक्षा कर यह भी देखा जाएगा कि व्यवस्था अपने उद्देश्य को कितना पूरा कर रही है।
फिलहाल, इसे अस्थायी व्यवस्था कहा गया है, लेकिन इसके निहितार्थ दूरगामी हैं। शायद यही कारण है कि इस बार अदालत से निकला संदेश किसी आदेश से अधिक एक सामाजिक आह्वान जैसा प्रतीत होता है, ईंधन बचाइए, भविष्य बचाइए।
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