
Jabalpur News : सुरेंद्र दुबे, नई दुनिया, जबलपुर। साठोत्तरी कथा के महानायक ज्ञानरंजन ने हिंदी कहानी की स्थापित परंपरा में सेंध लगाते हुए पहला काम तो यही किया कि उन्होंने कहानी को कहानी ही नहीं रहने दिया। उन्होंने कथा-वस्तु या कथानक का कचूमर निकालते हुए कहानी का कायाकल्प इस रूप में कर दिखाया कि इसमें एक साथ गद्य की लगभग सभी विधाओं का समावेश हो गया और वह भी अनायास सादगी के साथ। ये शब्द हैं-संस्कारधानी जबलपुर निवासी साहित्यकार मनोहर बिल्लौरे के, जिन्होंने बताया कि 21 नवंबर, 2023 को ज्ञानरंजन ने आयु के 87 वर्ष पूर्ण कर 88 वें वर्ष में प्रवेश कर चुके ज्ञानरंजन नई किताब शीघ्र ही आने वाली है, जिसकी शीर्षक है-कथा यदि तुम कहो।
कथा यदि तुम कहो के संयोजक सुरेश पांडे ने अपने संयोजकीय-वक्तव्य में लिखा है- ‘किसी भी भाषा या युग में ऐसे लेखक बहुत अधिक नहीं होते जो अपनी परम्परा का विकास, बहुत-कुछ उसे तोड़ कर और बहुत-कुछ उसे छोड़ कर करते हैं और ऐसा करते हुए एक नये साहित्य-विमर्श की आवश्यकता को आमंत्रण देते हैं। ज्ञानरंजन इन्हीं थोड़े-से लेखकों में एक हैं। उन्होंने साहित्य की परम्परा प्रसूत आस्वाद-संस्कृति के स्थापित स्तरों और आयामों का विस्तारीकरण तो किया ही है, उनका प्रसंगानुकूल तात्विक नवीनीकरण भी किया है। और यह कार्य उन्होंने बगैर शोरगुल के, बगैर अपनी कथित कथा-पीढ़ी का झंडा उठाऊ, बगैर निजी वक्तव्यबाजी (शब्द उन्हीं का है) द्वारा आभासी दुनिया निर्मित किए चुपचाप बिल्कुल गुमसुम तरीके से किया है। गुजरे जमाने के यशस्वी आलोचक आचार्य नलिन विलोचन शर्मा की प्रेमचंद पर की गई टिप्पणी उधार लेकर कहूं : खून का कतरा भी न गिरा और क्रांति हो गई।‘‘
मनोहर बिल्लौरे ने बताया कि उम्र के इस पड़ाव पर भी ज्ञानरंजन की सजग सक्रियता में लेश भर भी कमी नहीं आई है। उन्होंने कहानी लिखना पहल के शुरू होने से पहले, मतलब आठवें दशक की शुरूआत के आसपास बंद कर दिया था। पर उनकी जिन 26 कहानियों ने 60 के बाद जो धूम मचाई उसकी धमक अब भी हर कहानी प्रेमी को आकर्षित करती है। उनमें डूबकर उन्हें पुनः देखने की मंशा पैदा करती हैं। असहज कर, बेचैन करती हैं और संवेदनशील कथा-पाठक लेखक भी हो, तो लिखने को विवश भी।
मुझे बार-बार बराबर लगता रहा है कि ज्ञान जी द्वारा अन्यों को-लेखकों भर को नहीं-लिखे महत्त्वपूर्ण पत्रों की किताब के लिए-ज्ञानरंजन का जिनसे सघन पत्राचार हुआ है-पत्र प्राप्त कर उनका संपादन करने का कार्यभार कोई वहन करे, तो यह एक बड़ा ठोस और स्थायी काम होगा। इससे ज्ञानरंजन के व्यक्तित्व के अभिन्न, अनजाने, दबे, लुके-छिपे, विश्वसनीय-अविश्वनीय पक्षों, उनके सामाजिक-सांस्कृतिक सम्बंधों का अनावरण होगा। कथाकार, सम्पादक, शैलीकार के रूप में तो सभी का उनसे परिचय है ही। उनके द्वारा संपादित इस महादेश के वैज्ञानिक विकास के लिए समर्पित पत्रिका पहल के प्रत्येक अंक अनमोल धरोहर से कम नहीं हैं, इसी भांति पत्र-साहित्य भी लाजवाब साबित होना तय है।
ज्ञानरंजन अपनी कहानियों में हमारे तथाकथित सभ्य समाज की, बखिया बेदर्दी से उधेड़ने वाले अनूठे कथाकार हैं। भाषा के मामले में वे निराला, परसाई, मुक्तिबोध, शमशेर, नागार्जुन जैसे रचनाकारों की तरह बागी लेखक हैं। भाषा को तोड़ते, मरोड़ते हैं। भाषा और शैली को बासी और मलिन नहीं होने देते। उसे मांजकर उजला दमकवान और ऊर्जस्वित बनाने का उपक्रम जारी रखते हैं। कहानियां हों या कथेतर गद्य या फिर पत्रावलियां, शब्दों के अनूठे प्रयोग से भाषा को नए संस्कार देना, उनकी फितरत में गहरे तक जज्ब है।
ज्ञानरंजन की कहानियों के कई छोटे-बड़े वाक्य पानी में पत्थर फेंकने पर उठने वाली वृत्ताकार तरंगों सा प्रभाव मन पर डालते हैं। पैदा करते हैं। एक सवाल जरूर उठता रहा है कि ज्ञानरंजन ने अपनी अधिकतर कहानियों में मैं वाचक क्यों चुना। क्या कुछ कहानियां अन्य-पुरुष सूत्रधार द्वारा नहीं लिखी/कही जा सकती थीं। और लिखी/कही जातीं तो क्या वही प्रभावान्विति होती, जो इन कहानियों की रग-रग, रेशे-रेशे में मौजूद है। यह विचारणीय है। इन्हें मैं के अलावा अन्य सूत्रधार रचता तो क्या वह कहानियों को वैसा कालातिक्रमक बना सकता था, जैसा कि वे (कहानियां) बन पाईं। तीक्ष्ण, बेधक, धारदार, भीतर तक उतरता, मन को झनझना-खनखना-टनटना देने वाला प्रभाव पैदा कर पातीं।