जबलपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि । मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम-1998 में किए गए ताजा संशोधन को चुनौती के मामले में केंद्र व राज्य शासन को नोटिस जारी कर जवाब-तलब कर लिया है। इसके लिए 23 फरवरी तक का समय दिया गया है।
शुक्रवार को मुख्य न्यायाधीश मोहम्मद रफीक व जस्टिस विजय कुमार शुक्ला की युगलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। इस दौरान जनहित याचिकाकर्ता नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच, जबलपुर के प्रांताध्यक्ष डॉ.पीजी नाजपांडे व डॉ.एमए खान की ओर से अधिवक्ता दिनेश उपाध्याय ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि सरकारी कर्मियों व लोकसेवकों का भ्रष्टाचार नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 लाया था। यह अधिनियम अपने मकसद में कुछ हद तक कामयाब भी रहा। लेकिन केंद्र सरकार ने हाल ही में इस अधिनियम में संशोधन कर इसमें नई धारा-17 (ए) जोड़ दी। इस धारा के तहत प्रावधान कर दिया गया कि लोकसेवकों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले की शिकायत पर जांच आरम्भ करने के पूर्व सक्षम अधिकारी से अनुमति लेना आवश्यक है।
संशोधन कर बाधा पैदा करने का प्रयास : अधिवक्ता दिनेश उपाध्याय ने इस संशोधन को गैरकानूनी बताया। उन्होंने तर्क दिया कि लोकसेवक की परिभाषा मे सभी अधिकारी और जनप्रतिनिधि (विधायक-मंत्री) आते हैं। नए प्रावधान के तहत इनके खिलाफ जांच की अनुमति देने वाला भी सरकारी अधिकारी होगा। इसके चलते इन लोकसेवकों के खिलाफ जांच की अनुमति निष्पक्षता से प्रदान की जाएगी, यह संदेह के घेरे में है। उन्होंने दलील दी कि अधीनस्थ कार्यरत अधिकारी अपने वरिष्ठ अधिकारी या जनप्रतिनिधि के खिलाफ अनुमति देने से गुरेज करेंगे। इस तरह से भ्रष्टाचार अधिनियम 1988 की वास्तविक मंशा पूरी होने में केंद्र सरकार ने इसमें संशोधन कर बाधा पैदा करने का प्रयास किया। आग्रह किया गया कि उक्त संशोधन को विधिविरुद्ध मानते हुए निरस्त करने के निर्देश दिए जाएं। प्रारंभिक सुनवाई के बाद कोर्ट ने याचिका में बनाए गए अनावेदकों को नोटिस जारी करने के निर्देश दिए।