
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। जबलपुर जिले में पांच साल तक के बच्चों की मृत्यु का आंकड़ा सामने आया है। अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच छह माह में 643 बच्चों की मौत हुई है। इनमें 553 बच्चे
तो एक साल से भी कम उम्र के थे, जबकि 445 नवजात शून्य से 28 दिन के अंदर ही काल के गाल में समा गए। जिला स्वास्थ्य विभाग की फैक्ट फाइल के अनुसार 643 में से 601 मौतें संस्थागत हुईं, यानि अस्पताल में इलाज के दौरान, जबकि 42 बच्चों ने घर में या अस्पताल ले जाते समय रास्ते में दम तोड़ा।
सबसे अहम बात यह है कि इन 643 मौतों में 20 फीसदी केस अन्य जिलों के रेफर केस हैं। सिवनी, मंडला, डिंडोरी, कटनी और नरसिंहपुर से गंभीर हालत में बच्चे जबलपुर मेडिकल कॉलेज और एल्गिन रेफर किए गए, जिनमें से कई को बचाया नहीं जा सका और मौत जबलपुर के खाते में जुड़ गई।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज : कुल भर्ती में मृत्यु दर 14 फीसदी से कम। लेकिन चूंकि यहां सबसे गंभीर बच्चे आते हैं, संख्या ज्यादा दिखती है।
एल्गिन महिला अस्पताल : मृत्यु दर सिर्फ 3.8 प्रतिशत। यहां छह माह में शहर व आसपास के जिलों से केस आए। एल्गिन में ज्यादातर प्रसव सामान्य होते हैं, लेकिन प्रीमेच्योर और कम वजन वाले बच्चों को तुरंत मेडिकल रेफर किया जाता है।
क्यों हो रहीं मौत
उम्रवार विश्लेषण 0-28 दिन (445 मौतें)
कारण - प्रीमेच्योर जन्म (38 फीसदी), कम वजन (1000-1500 ग्राम) - 35 फीसदी
बर्थ एस्फिक्सिया (जन्म पर न रोना) - 15 फीसदी, इंफेक्शन - 12 फीसदी
अन्य समस्या : निमोनिया, डायरिया, कुपोषण और जन्मजात विकृति
गंभीर कुपोषण, निमोनिया, दुर्घटना और देर से इलाज
मध्य प्रदेश में शिशु मृत्यु दर 24 है, जबकि जिले का 20 है। इस लिहाज से जिले की स्थिति संतोषजनक मानी जा सकती है। यह प्रति 1,000 जीवित जन्म लेने वाले बच्चों पर, उनके पहले जन्मदिन (एक वर्ष की आयु) से पहले मरने वाले शिशुओं की संख्या को दर्शाता है।
शिशु रोग विशेषज्ञ व जिला टीकाकरण अधिकारी डॉ. विनोद गुप्ता के अनुसार हमने अब हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं की ट्रैकिंग शुरू की है। हर ब्लाक पर एनबीएसयू को मजबूत किया जा रहा है ताकि बच्चे को जबलपुर रेफर करने से पहले ही प्राथमिक इलाज मिल जाए। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और राज्य सरकार के मार्गदर्शन पर स्वास्थ्य विभाग का लक्ष्य है कि 2030 तक शिशु मृत्यु दर का आंकड़ा 10 फीसदी से नीचे लाने पर कार्य कर रहे हैं।