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वेटरनरी विवि के वाइल्डलाइफ हेल्थ सेंटर में तेंदुए के इलाज पर उठे सवाल, आरोप- 16 दांत टूटे, अब सेहत और भी गंभीर

जबलपुर वेटरनरी विश्वविद्यालय के वाइल्डलाइफ हेल्थ सेंटर में इलाज के दौरान एक मादा तेंदुए के 16 दांत टूटने के आरोपों के बाद कानूनी नोटिस जारी किया गया ह...और पढ़ें

By Atul ShuklaEdited By: Akriti Kumari
Publish Date: Sat, 01 Aug 2026 12:15:33 PM (IST)Updated Date: Sat, 01 Aug 2026 12:17:39 PM (IST)
वेटरनरी विवि के वाइल्डलाइफ हेल्थ सेंटर में तेंदुए के इलाज पर उठे सवाल, आरोप- 16 दांत टूटे, अब सेहत और भी गंभीर
जबलपुर वेटरनरी विवि के वाइल्डलाइफ हेल्थ सेंटर में इलाज के दौरान तेंदुए के 16 दांत टूटे। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. वेटरनरी विश्वविद्यालय के 'स्कूल ऑफ वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक एंड हेल्थ' में पर गंभीर आरोप लगे हैं
  2. एडवोकेट डॉ. दीपा कुलश्रेष्ठ और स्पेशलिस्ट मनीष कुलश्रेष्ठ ने विश्वविद्यालय को कानूनी नोटिस भेजा है
  3. विश्वविद्यालय की कुलसचिव डॉ. राखी वैश्य ने निष्पक्ष जांच के लिए कमेटी का गठन भी किया है

प्रतिनिधि, जबलपुर। नरसिंहपुर जिले से रेस्क्यू कर 'स्कूल ऑफ वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक एंड हेल्थ' में लाई गई एक मादा तेंदुए के उपचार को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। संस्थान में तीन महीने तक चले इलाज के दौरान तेंदुए के 16 दांत टूट जाने का गंभीर आरोप लगा है। इससे अब वह न तो शिकार करने की स्थिति में है। न ही सामान्य रूप से भोजन कर पा रही है।

कई सेप्शलिस्ट ने इलाज की प्रक्रिया पर एतराज जताआ है। साथ ही वेटरनरी विश्वविद्यालय प्रशासन से लेकर वन विभाग के उच्च अधिकारियों तक शिकायत दर्ज कराई है।

कंक्रीट के बाड़े में कैद और लापरवाही के आरोप

एडवोकेट डॉ. दीपा कुलश्रेष्ठ ने संबंधित विभागों और जिम्मेदार अधिकारियों को एक कानूनी नोटिस भेजा है। नोटिस में कहा गया है कि मादा तेंदुए को 'कैनाइन डिस्टेंपर डिजीज' (CDV) के इलाज के लिए लाया गया था। उसे प्राकृतिक माहौल के बजाय कंक्रीट की दीवारों, फर्श, ट्यूबलाइट और पंखों वाले कृत्रिम बाड़े में लंबे समय तक रखा गया, जिससे उसकी शारीरिक स्थिति बिगड़ी। वहीं, तीन महीने की कैद के दौरान तेंदुआ एक बार बाड़े से बाहर निकल गया था, जिसे बाद में दोबारा पकड़ा गया। लंबे समय तक इन परिस्थितियों में कैद रहने की वजह से तेंदुए के कैनाइन दांत टूट गए और घिस गए हैं।


लैब की मान्यता और कानूनी वैधता पर भी सवाल

एनिमल सेप्शलिस्ट मनीष कुलश्रेष्ठ ने आरोप लगाया है- रजिस्ट्रेशन का अभाव: यह संस्थान 'वेटरनरी काउंसिल ऑफ इंडिया' (VCI) से पंजीकृत नहीं है। न ही इसकी लैब और उपकरणों को NABH की मान्यता प्राप्त है। इसके बावजूद यहां वन्यजीवों का इलाज और फॉरेंसिक प्रक्रियाएं की जा रही हैं। वहीं, वन्यजीव रेस्क्यू का मुख्य उद्देश्य बीमार जीव का इलाज कर उसे जल्द से जल्द प्राकृतिक आवास में छोड़ना होता है, न कि उसे अनिश्चितकाल के लिए बाड़े में कैद रखना।

कानूनी नोटिस में की गई मुख्य मांगें

इस वजह से वेटरनरी विश्वविद्यालय को कानूनी नोटिस भी भेजा गया है। नोटिस में मांग की गई-

  • तेंदुए को 3 महीने से अधिक समय तक कैद में रखने की वैधानिक अनुमति और कानूनी आधार सार्वजनिक किया जाए।
  • तेंदुए के टूटे हुए दांतों, समग्र स्वास्थ्य परीक्षण और व्यवहार निगरानी से जुड़े सभी दस्तावेज उपलब्ध कराए जाएं। स्वतंत्र पशु चिकित्सकों की टीम से जांच कराई जाए।
  • तेंदुए के उपचार, पुनर्वास और प्रस्तावित रिहाई की पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच हो।
  • 'वन्यजीव संरक्षण अधिनियम', 'राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण' (NTCA) की गाइडलाइन और 'पशु क्रूरता निवारण अधिनियम' के संभावित उल्लंघनों की उच्च स्तरीय जांच की जाए।

विश्वविद्यालय प्रशासन का पक्ष

इसे लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन का पक्ष भी सामने आया है। जबलपुर वेटरनरी विश्वविद्यालय की कुलसचिव डॉ. राखी वैश्य ने कहा- इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच के लिए एक विशेष कमेटी का गठन कर दिया गया है। समिति की जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद ही इस विषय पर कुछ आधिकारिक तौर पर कहा जा सकेगा।