जबलपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि। संस्कारधानी के उपनगरीय क्षेत्र गढ़ा में पंडा की मढ़िया एक महत्वपूर्ण शक्तिपीठ है। यहां सहस्त्राधिक वर्ष से स्वयंभू कंकाली व मरही माता पूजित हैं। चैत्र की भांति शारदीय नवरात्र में यहां देवी भक्तों की भीड़ उमड़ती है। सुबह से रात्रि तक पूजन-अर्चन अविराम रहता है। महिलाएं जल ढारने के लिए लंबी पंक्ति में खड़ी रहती हैं। समीपस्थ इमरती तालाब को नवरात्र के दौरान विशेष रूप से साफ किया जाता है। यहां चारों तरफ पूजन-सामग्री की दुकानें भी लगती हैं।

इतिहास :

इस शक्तिपीठ का इतिहास शोध का विषय है। ऐसा इसलिए क्योंकि यह स्थान गोंडवाना व कल्चुरी काल से भी पूर्व का माना जाता है। पंडा परिवार के पूर्वजों ने अपने वंशजों को जो जानकारी दी उसके अनुसार मंदिर से लगा हुए एक पहाड़ था। उस पहाड़ से निकलकर एक शेर मंदिर में प्रवेश करता था और देवी के दर्शन कर चला जाता था। यहां विराजित कंकाली माता को स्थापित नहीं किया गया बल्कि उन्होंने भूमि से स्वयं प्रकट होकर भक्तों को दर्शन दिए थे। कई वर्ष पूर्व मंदिर के ऊपर बिजली गिरी थी, माता ने पंडा की रक्षा करते हुए बिजली अपने ऊपर ले ली। जहां बिजली गिरी थी, वहां एक गहरा कुंड बन गया। उस कुंड की गहराई कोई नहीं नाप पाया। खतरे को देखते हुए कुंड को ऊपर से बंद कर दिया गया। अब माता के विग्रह से कुंड का जल शनै:-शनै: रिसता है। उस जल के पान से कई बीमारियों व चर्मरोग दूर हो जाते हैं। कंकाली माता के साथ विराजित मरही माता की आराधना के लिए कई तांत्रिक यहां आ चुके हैं। मनोरथ सिद्धि के लिए यह स्थान बहुत महत्वपूर्ण है।

गोंडवाना काल से जारी है जवारा विसर्जन समारोह :

पंडा बताते हैं कि यह स्थान हजारों साल पुराना है, लेकिन मढ़िया को गोंडवाना काल में जीर्णोद्धार कर बड़ा आकार दिया गया था। उसी समय से जवारा स्थापना व विसर्जन की परंपरा को गति दी गई। तभी से सप्तमी, अष्टमी व नवमीं को महाआरती का भी विधान है। जवारा यात्रा से पूर्व मंदिर परिसर के उस नीम के वृक्ष को पूजा जाता है, जिससे एक बार दूध की धार निकली थी। नवरात्र के समय असुविधा के बचने के लिए अनुशासन को विशेष महत्व दिया जाता है। प्रवेश व निकास के द्वारा विभक्त कर दिए जाते हैं।

इनका कहना-

हमारे पूर्वज बड़े दादा, छोटेलाल, अमृतलाल, होरीलाल पंडा की मढ़िया में पूजा-पाठ के लिए अधिकृत रहे हैं। वर्तमान में पांचवीं व छठवीं पीढ़ी इसे गति दे रही है। गढ़ा सहित संपूर्ण जबलपुर के भक्त हमारे परिवार को सम्मान देते हैं। कंकाली माता की विश्राम मुद्रा की प्रतिमा स्वयंभू होने के कारण भक्तों को आराधना का शीघ्र फल देती हैं। मरही माता का जिसे आशीर्वाद मिल जाए, उसके सर्व संकट दूर हो जाते हैं। नवरात्र में नौ दिन तक हम माता व भक्तों की सेवा में जुटे रहते हैं, इससे परमानंद मिलता है।

-हेमंत कुमार पंडा

पंडा की मढ़िया में पूजन-अर्चन से तन-मन में पवित्रता का संचार होता है। यही वजह है कि जो एक बार यहां आता है, प्रतिवर्ष नवरात्र में माथा टेकने आने लगता है। यहां कण-कण में मातारानी की शक्ति की सहज अनुभूति होती है। कुछ देर शांति से बैठने पर संपूर्ण शरीर में शक्ति का संचार हो जाता है। इसीलिए मुझे बाल्यकाल से यह स्थान अत्यंत प्रिय है।

-शिवम कुमार, भक्त

Posted By: tarunendra chauhan

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