
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर : हाई कोर्ट ने बरकतुल्ला विश्वविद्यालय, भोपाल के प्रोजेक्ट आफिसर नरेंद्र त्रिपाठी की बर्खास्तगी के मामले में नया मोड़ आने पर सख्ती बरती है। दरअसल, विवि प्रशासन के जिन दस्तावेजों के जरिए याचिकाकर्ता की बर्खास्तगी की जानकारी गई थी, उनकी वैधानिकता पर प्रश्नचिन्ह लग गया है।
याचिकाकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया है कि विवि प्रशासन द्वारा कभी भी बर्खास्तगी का आदेश निकाला ही नहीं। हाई कोर्ट में फर्जी दस्तावेज पेश किए गए हैं। इस जानकारी पर हाई कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए सख्त लहजे में कहा कि यदि दस्तावेज फर्जी निकले तो विवि प्रशासन पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
न्यायमूर्ति संजय द्विवेदी की एकलपीठ ने विवि के रजिस्ट्रार को ओरिजनल फाइल पेश करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 30 अप्रैल को निर्धारित की गई है। आगामी सुनवाई तक नरेन्द्र त्रिपाठी की बर्खास्तगी के आदेश पर रोक बरकरार रहने की व्यवस्था दी गई है।
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता भोपाल निवासी नरेन्द्र त्रिपाठी की ओर से अधिवक्ता एलसी पटने व अभय पांडे ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि 21 फरवरी, 2024 को याचिकाकर्ता को यह कहकर बर्खास्त कर दिया गया कि जब 1998 में उनकी नियुक्ति हुई थी तब विश्वविद्यालय ने नियमों का पालन नहीं किया गया था।
दलील दी गई कि याचिकाकर्ता पिछले 26 वर्ष से सेवारत है और उसके विरुद्ध कोई भी कदाचरण की शिकायत नहीं है। वर्ष 2012 में उन्हें नियमित भी कर दिया गया। अवैध नियुक्ति के संबंध में दो बार जांच हुई है। पहली जांच में याचिकाकर्ता को क्लीन चिट दी गई। दूसरी जांच में याचिकाकर्ता का पक्ष नहीं सुना गया। जिस अधिकारी ने पहली जांच में क्लीन चिट दी थी, उसी ने दूसरी जांच में नियुक्ति को अवैध करार दिया।
कोर्ट को बताया गया कि जिस आदेश का हवाला देकर बर्खास्तगी बताई गई, वह आदेश विवि ने कभी निकाला ही नहीं। याचिकाकर्ता ने इस संबंध में सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी तो विवि ने कहा कि रिकार्ड उपलब्ध नहीं है।