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जबलपुर में सिहोरा के खितौला में 56 किलो गांजा जब्ती में अभियोजन नाकाम, वाहन स्वामी बरी

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने पुलिस विवेचना, जब्ती की वैधानिक प्रक्रिया और साक्ष्यों की श्रृंखला में गंभीर त्रुटियों की ओर न्यायालय का ध्यान आकर्षित कि...और पढ़ें

By Surendra DubeyEdited By: Dheeraj kumar Bajpai
Publish Date: Fri, 24 Jul 2026 12:47:33 PM (IST)Updated Date: Fri, 24 Jul 2026 12:47:33 PM (IST)
जबलपुर में सिहोरा के खितौला में 56 किलो गांजा जब्ती में अभियोजन नाकाम, वाहन स्वामी बरी
न्यायालय ने वाहन स्वामी रज्जू सिंह उर्फ राजू सिंह लोधी को दोषमुक्त करते हुए स्पष्ट किया।

HighLights

  1. एनडीपीएस न्यायालय, जबलपुर का फैसला
  2. आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में विफल
  3. वाहन स्वामी होने से आपराधिक दायित्व सिद्ध नहीं होता

नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। करीब ढाई वर्ष तक चली सुनवाई के बाद विशेष न्यायाधीश, एनडीपीएस एक्ट प्रबेन्द्र कुमार सिंह की अदालत ने सिहोरा के खितौला थाना क्षेत्र में 56 किलो 236 ग्राम गांजा जब्ती प्रकरण में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।

रज्जू सिंह उर्फ राजू सिंह लोधी को दोषमुक्त

न्यायालय ने वाहन स्वामी रज्जू सिंह उर्फ राजू सिंह लोधी को दोषमुक्त करते हुए स्पष्ट किया कि अभियोजन उनके विरुद्ध आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा।

बोलेरो वाहन से गांजा जब्त किया गया था

रज्जू सिंह की ओर से अधिवक्ता संदीप जैन ने पैरवी की।अभियोजन के अनुसार 20 फरवरी, 2024 को खितौला थाना क्षेत्र में बोलेरो वाहन से 56 किलो 236 ग्राम गांजा जब्त किया गया था।

अवैध परिवहन और आपराधिक षड्यंत्र का आरोपित बनाया था

पुलिस ने वाहन स्वामी रज्जू सिंह को भी अवैध परिवहन और आपराधिक षड्यंत्र का आरोपित बनाया था। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने पुलिस विवेचना, जब्ती की वैधानिक प्रक्रिया और साक्ष्यों की श्रृंखला में गंभीर त्रुटियों की ओर न्यायालय का ध्यान आकर्षित किया।

स्वामी होने से आपराधिक दायित्व सिद्ध नहीं हो जाता

बचाव पक्ष का तर्क था कि केवल वाहन स्वामी होने मात्र से आपराधिक दायित्व सिद्ध नहीं हो जाता, जब तक उसकी संलिप्तता ठोस एवं विश्वसनीय साक्ष्यों से प्रमाणित न हो।

संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया

न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए माना कि अभियोजन रज्जू सिंह के विरुद्ध आरोपों की कानूनी कसौटी पर पुष्टि नहीं कर सका। परिणामस्वरूप उन्हें संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया गया।

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