
जबलपुर, रवीन्द्र सुहाने। गुरु ने दो वर्ष तक अंग्रेजी ने बोलने का संकल्प दिला दिया। फिर क्या था हिंदी बोलना सीखा। दो वर्ष तक लगातार अभ्यास किया और हिंदी सीख ली। अब भारत में सभी से हिंदी में ही बात करता हूं। यह बात चर्चा के दौरान अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ हवॉई में धर्म विभाग के प्रोफेसर रामदास ने कही।
उन्होंने बताया कि मां काफी गरीब थीं, जो दूसरों के घरों में सफाई करने जाया करतीं थीं। वहां से पुस्तकें ले आती थीं। एक बार महात्मा गांधी की पुस्तक लेकर आईं, जिसे पढ़कर भारत आने का मन हुआ। लोगों के सहयोग से 20 साल की उम्र में पहली बार भारत आया। दूसरी बार 22 वर्ष की उम्र में भारत आया। उन्होंने बताया कि इसके बाद चित्रकूट में मानस महाआरती त्यागी महाराज के सानिध्य में आया और उनकी दीक्षा ले ली।
अमेरिका में रामलीला करती है स्टार्नफील्ड की टीम
25 साल पहले यूनिवर्सिटी में अचानक महर्षि वाल्मीकि की तस्वीर देखी, इसमें उन्हें अपने पिता की सूरत नजर आई। उनके बारे में जानकारी एकत्रित की और वाल्मीकि रामायण पढ़ी तभी से रामायण का दीवाना हो गया। यह बात वर्ल्ड रामायण कांफ्रेंस में शामिल होने आए महर्षि यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट पेयरफिल्ड, लोवा यूएसए के प्रोफसर माइकल स्टार्नफिल्ड ने कही। उन्होंने बताया कि उनकी 400 लोगों की एक टीम है, जिसमें बच्चे, युवा व बुजुर्ग शामिल हैं, जो वाल्मीकि रामायण पर आधारित रामलीला करते हैं। उनकी ड्रेस भारतीय रामलीला से मिलती जुलती है।
थाईलैंड की प्राइमरी शिक्षा में शामिल रामायण
बैंकाक की सिल्पाकॉर्न यूनिवर्सिटी के एसोसिएटेड प्रोफेसर बूंमरूग खाम-ए ने बताया कि थाईलैंड में रामायण लिटरेचर की तरह स्कूल और कॉलेजों के पाठ्यक्रम में शामिल है। यूनिवर्सिटी के खोन (नाट्य) विभाग के छात्र सबसे अधिक रामलीला को पसंद करते हैं। थाईलैंड में रामायण को रामाकेन और रामाकृति बोलते हैं। जो वाल्मीकि रामायण से मिलती जुलती है, लेकिन इसमें थाई कल्चर का समावेश है। उन्होंने बताया कि यूनिवर्सिटी के अनेक विद्यार्थी रामायण पर पीएचडी कर रहे हैं। इसमें से कुछ वर्ल्ड रामायण कांफ्रेंस में शामिल होने जबलपुर आए हैं।
थाईलैंड की रामायण में हनुमानजी ब्रह्मचारी नहीं
प्रोफेसर बंमरूग खाम-ए ने बताया कि भारत की वाल्मीकि रामायण में हनुमान जी को ब्रह्मचारी बताया गया है। जबकि थाईलैंड की रामायण (रामाकेन) में हनुमानजी की पत्नी और पुत्र का उल्लेख है।
हम हिंदी प्रेमी हैं
थाईलैंड से आईं चारिया धर्माबून हिंदी प्रेमी हैं। पढ़ाई के दौरान राम का चरित्र से प्रभावित होकर रामायण पर पीएचडी कर रहीं हैं। उन्होंने अपने इस प्रेम को टीशर्ट पर 'हम हिंदी प्रेमी हैं' के रूप में भी लिखा रखा है। वर्ल्ड रामायण कांफ्रेंस में शामिल होंने उनके साथ सुपापोर्न पलाइलेक, चोनलाफाट्सोर्न बिनिब्राहिम और पिबुल नकवानीच आए हैं। सभी शिल्पाकर्न यूनिवर्सिटी से रामायण में पीएचडी कर रहे हैं। पीएचडी करने वाले विद्यार्थी रामायण पर आधारित पैंटिंग और रामलीला भी करते हैं।
भारत के मंदिरों का इतिहास खोज निकाला
अमेरिका के डॉ. स्टीफन कनाप ने बताया कि उन्हें हर विषय की गहराई में जाना अच्छा लगता है। 1973-74 में रामायण के बारे में जानकारी मिली, जिसे पढ़ा और इसकी खोज में भारत आया। यहां रामायण के संबंध में काफी खोज की। अनेक किताबें लिख चुके डॉ. स्टीफन ने बताया कि उन्होंने भारत के मंदिरों के इतिहास की खोज कर उन पर अनेक पुस्तकें लिखी हैं।