जबलपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि। हाई कोर्ट व जिला न्यायालय ने अविभाजित पैतृक संपत्ति के विक्रय को अवैधानिक निरूपित किया है। इस सिलसिले में दो महत्वपूर्ण आदेश पारित हुए हैं। जिला न्यायालय के द्वितीय व्यवहार न्यायाधीश मनमोहन सिंह कौरव ने अपने महत्वपूर्ण आदेश के जरिए अविभाजित पैतृक भूमि के विक्रय पर रोक लगा दी है।
आवेदिका ग्राम कठियाघाट रांझी निवासी छित्तनबाई की ओर से अधिवक्ता कृष्ण कुमार पांडे व कौशलेश पांडे ने पक्ष रखा था। उन्होंने दलील दी थी कि आवेदिका के पिता स्व. हन्नूलाल के केवल दो वारिस थे, पहला आवेदिका छित्तनबाई व दूसरी उसकी बहन रखिया बाई। इस तरह पैतृक भूमि पर आवेदिका का आधा हिस्सा है। अब तक बंटवारा नहीं हुआ है। इसके बावजूद दूसरी हिस्सेदार ने अपने पति व पुत्रों के साथ मिलकर न केवल राजस्व रिकार्ड में अपना नाम दर्ज कराया गया बल्कि मनमाने तरीके से भूमि का विक्रय भी कर दिया गया। यही नहीं जो भूमि राष्ट्रीय राजमार्ग के लिए अधिग्रहित हुई, उसका मुआवजा तक गुमराह करके हासिल कर लिया। इस सिलसिले में आवेदिका को कोई जानकारी नहीं दी गई। अब जो भूमि शेष बची है, उसे भी चोरी-छिपे बेचने की कोशिश जारी है। इसीलिए न्यायालय आना पड़ा।
इसी तरह मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी एक फैसले में विधिक बिंदु निर्धारित करते हुए कहा कि संयुक्त हिन्दू परिवार की अविभाजित संपत्ति या उसका कोई भाग बिना बंटवारा किए बेचा नहीं जा सकता। न्यायाधीशअरुण कुमार शर्मा की एकलपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के 2020 में विनीता शर्मा के मामले में दिए फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि बंटवारा हुए बिना ऐसी संपत्ति का सहस्वामी अपनी हिस्से की संपत्ति भी नहीं बेच सकता। इस मत के साथ कोर्ट ने एक हिस्से के क्रेता ऊषा कनौजिया और रुक्मणि कनौजिया की द्वितीय अपील निरस्त कर दी।
छिंदवाड़ा निवासी सारु बाई, एकनाथ सहित सात अनावेदकों की ओर से पहले सिविल कोर्ट में जमीन का दावा पेश किया था। अनावेदकों की ओर से अधिवक्ता सुशील कुमार तिवारी, रावेंद्र तिवारी व निशांत राय ने बताया कि पांड्रू ने उक्त जमीन ऊषा, रुक्मणि और भारती को बेच दी थी। आरोप लगाया गया कि पांड्रू ने अपने हिस्से से अधिक जमीन बेच दी थी, जबकि उसका बंटवारा भी नहीं हुआ था। सिविल कोर्ट ने रजिस्ट्री शून्य कर जमीन को सात भागों में बांटकर अनावेदकों के नाम कर दिया था। इसके बाद ऊषा व रुक्मणि ने हाई कोर्ट में प्रथम अपील प्रस्तुत कर सिविल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी। हाईकोर्ट ने प्रथम अपील निरस्त कर दी। दोनों ने पुन: द्वितीय अपील पेश की। हाई कोर्ट ने सिविल कोर्ट और प्रथम अपील के फैसले को सही ठहराते हुए द्वितीय अपील भी निरस्त कर दी। इस आदेशों को न्याय दृष्टांत माना जा रहा है।