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सरकारी स्कूल से 12वीं तक पढ़े छात्रों को मिले नौकरी में प्राथमिकता, ओबीसी आरक्षण पर बहस में बड़ा सुझाव, रिजर्वेशन ही खत्म कर दें

उन्होंने आरक्षण व्यवस्था के साथ सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता और मेरिट को लेकर भी महत्वपूर्ण सुझाव रखे। अब बुधवार पांच अगस्त को मामले में अंतिम बहस होने ...और पढ़ें

By Surendra DubeyEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Tue, 04 Aug 2026 08:26:00 PM (IST)Updated Date: Tue, 04 Aug 2026 08:33:01 PM (IST)
सरकारी स्कूल से 12वीं तक पढ़े छात्रों को मिले नौकरी में प्राथमिकता, ओबीसी आरक्षण पर बहस में बड़ा सुझाव, रिजर्वेशन ही खत्म कर दें
सुनवाई में 27 प्रतिशत आरक्षण बरकरार रखने की मांग ।

HighLights

  1. वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर ठाकुर बोले
  2. 2019 में सरकार ने 555 पेज के जवाब में
  3. ओबीसी आबादी 51 प्रतिशत बताई थी

नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाई कोर्ट में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण से जुड़े मामलों की मंगलवार को 14वें दिन सुनवाई हुई। प्रशासनिक न्यायाधीश आनंद पाठक व न्यायमूर्ति विनय सराफ की विशेष युगलपीठ के समक्ष ओबीसी वर्ग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने लंबी बहस की।

सुनवाई के दौरान उन्होंने कहा कि यदि आरक्षण से किसी वर्ग को परेशानी है तो आरक्षण ही समाप्त कर दिया जाए और इसके स्थान पर कक्षा एक से 12वीं तक सरकारी स्कूल में पढ़े छात्रों को ही सरकारी नौकरी में प्राथमिकता देने का नियम बनाया जाए।


उन्होंने आरक्षण व्यवस्था के साथ सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता और मेरिट को लेकर भी महत्वपूर्ण सुझाव रखे। अब बुधवार पांच अगस्त को मामले में अंतिम बहस होने की उम्मीद है।

आरक्षण खत्म करना है तो यह नियम बनाएं

सुनवाई के दौरान मेरिट को लेकर चर्चा के बीच वरिष्ठ अधिवक्ता ठाकुर ने कहा कि उन्होंने सरकार को कई बार सुझाव दिया है कि यदि आरक्षण से किसी वर्ग को परेशानी है तो आरक्षण ही समाप्त कर दिया जाए। इसके स्थान पर नियम बनाया जाए कि कक्षा एक से 12वीं तक सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को ही सरकारी नौकरी के लिए पात्र माना जाए। उनके अनुसार इससे सभी वर्गों के लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाएंगे और शिक्षा व्यवस्था में समानता आएगी।

हाई कोर्ट जज ने भी सरकारी स्कूलों को लेकर जताई चिंता

न्यायमूर्ति आनंद पाठक ने भी सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पर चिंता जताई। उन्होंने अपने ग्वालियर कार्यकाल के दौरान चली ‘विद्या दान’ पहल का उल्लेख किया, जिसमें अधिकारी, आईआईटी से शिक्षित लोग और समाज के अन्य लोग सरकारी स्कूलों में जाकर बच्चों को पढ़ाते थे। उन्होंने बताया कि उस दौरान इंदौर के कलेक्टर सहित कई अधिकारी और शिक्षित लोग बच्चों को पढ़ाने पहुंचते थे। जस्टिस शील नागू ने भी इस पहल में पढ़ाने की इच्छा जताई थी। कोरोना काल के कारण यह पहल बंद हो गई।

2019 का 555 पेज का जवाब बना आधार

ओबीसी पक्ष ने कोर्ट को बताया कि तत्कालीन सरकार ने अगस्त 2019 में 27 प्रतिशत आरक्षण का कानून बनाया था और अक्टूबर 2019 में हाई कोर्ट में 555 पेज का जवाब दाखिल कर इसे उचित ठहराने का प्रयास किया था। वरिष्ठ अधिवक्ता ठाकुर ने कहा कि इसी जवाब में सरकार ने ओबीसी की आबादी 51 प्रतिशत बताई थी। उन्होंने अलग से डेटा जुटाने की आवश्यकता पर भी सवाल उठाया और महाजन व मंडल आयोग की रिपोर्टों का हवाला दिया।

ओबीसी की पहचान के लिए अलग डेटा की जरूरत नहीं

ठाकुर ने दलील दी कि ओबीसी की जातियों और उनकी सामाजिक स्थिति से संबंधित पर्याप्त सामग्री पहले से उपलब्ध है। महाजन आयोग की रिपोर्ट में प्रदेश की 92 ओबीसी जातियों का उल्लेख है। उन्होंने कहा कि क्रीमीलेयर के आधार पर नान-क्रीमीलेयर प्रमाणपत्र जारी करने की व्यवस्था पहले से है। ऐसे में ओबीसी की पहचान के लिए अलग से डेडिकेटेड कमीशन या डेटा जुटाने की आवश्यकता नहीं है।

भर्तियों में 60-65 हजार अभ्यर्थियों के प्रभावित होने का दावा

ठाकुर ने दावा किया कि 2019 से 2025 तक विभिन्न भर्तियों में 13 प्रतिशत ओबीसी और 13 प्रतिशत सामान्य वर्ग के पद होल्ड किए गए, जिससे करीब 60-65 हजार अभ्यर्थी प्रभावित हुए। उन्होंने आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों की मेरिट और चयन प्रक्रिया में कथित विसंगतियों के उदाहरण भी कोर्ट के समक्ष रखे। उनका कहना था कि कई ओबीसी अभ्यर्थी मेरिट में आने के बावजूद चयन प्रक्रिया में प्रभावित हुए।

27 प्रतिशत आरक्षण बरकरार रखने का आग्रह

ओबीसी पक्ष ने बहस के दौरान आरक्षण की आवश्यकता को आबादी के अनुपात और सामाजिक पिछड़ेपन से जोड़ते हुए अपनी दलील रखी। वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने अंत में कोर्ट से वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को बरकरार रखने का आग्रह किया। मामले में बुधवार पांच अगस्त को अंतिम बहस होने की उम्मीद है