सुरेंद्र दुबे, जबलपुर। संस्कारधानी जबलपुर निवासी सुभद्रा कुमारी चौहान, जिनकी राष्ट्रव्यापी ख्याति की वजह बनी बहुचर्चित कविता 'झाँसी की रानी', उनकी राष्ट्रप्रेम की भावना को सम्मानित करने के लिए उनके नाम पर 26 अप्रेल, 2006 को भारतीय तटरक्षक सेना में एक युद्धपोत को शामिल किया गया था। हालांकि इससे काफी पहले 6 अगस्त, 1976 को भारतीय डाक तार विभाग उनके सम्मान में 25 पैसे का डाक टिकट भी जारी कर चुका था।

प्रयागराज में जन्मीं सुभद्रा का विवाह वर्ष 1919 में खण्डवा निवासी ठाकुर लक्ष्मण सिंह के साथ हुआ, जिसके बाद यह दंपती जबलपुर चले आए। इस तरह इनकी पहचान जबलपुर निवासी के रूप में प्रगाढ़ हो गई। उनकी पुत्री सुधा चौहान ने 'मिला तेज से तेज' शीर्षक पुस्तक में बखूबी व्यक्तित्व-कृतित्व को रेखांकित किया है। हंस प्रकाशन, इलाहाबाद से छपी इस पुस्तक के अनुसार सुभद्रा बाल्यकाल से ही राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत कविताएं रचने लगीं थीं। आयु बढ़ने के साथ देश के स्वतंत्रता संग्राम में कविता के जरिए उनका नेतृत्व सामने आने लगा। उनकी अमर रचना 'झांसी की रानी' आजादी के दीवानों-परवानों-मस्तानों की जुबां में रच-बस गई। वहीं उनकी व्यापक कथा-दृष्टि ने उन्हें हिंदी साहित्य में अत्यंत लोकप्रिय कथाकार के रूप में स्थापित कर दिया।

उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सही गई जेल यातनाओं की अनुभूतियों को कहानियों के माध्यम से अभिव्यक्त किया। उनकी रचनाओं में वातावरण चित्रण प्रधान शैली की प्रमुखता के अलावा भाषा सरल और काव्यमय होने के साथ-साथ रचना की सादगी हृदयग्राही होती थी। बिखरे मोती, उन्मादिनी, सीधे-सादे चित्र उनके तीन कहानी संग्रह और मुकुल, त्रिधारा उनके दो काव्य संग्रह हैं। हींगवाला कहानी पाठ्यक्रम में शामिल हुई। वहीं विद्यार्थियों ने बचपन में इन पंक्तियों को खूब मन लगाकर पढा-"यह कंदब का पेड़ अगर मां होता यमुना तीरे, मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे।

" बहरहाल, सुभद्रा 1921 में महात्मा गांधी के असहयोग अंदोलन में शामिल होने वाली देश की प्रथम महिला थीं। यही नहीं जबलपुर के टाउन हॉल में झंडा सत्याग्रह के दौरान गिरफ्तार होकर जेल जाने वाली प्रथम महिला स्वाधीनता संग्राम सेनानी होने का गौरव भी उन्हीं के नाम दर्ज है।

16 अगस्त, 1904 को जन्मीं सुभद्रा का महज 43 वर्ष की अल्पायु में 15 फरवरी, 1948 को जबलपुर के समीप सिवनी में कार दुर्घटना से आकस्मिक निधन हो गया था। 15 अगस्त, 1947 को भारत सदियों की गुलामी से आज़ाद हुआ और इसके एक वर्ष बाद ही सुभद्रा संसार-चक्र से मुक्त हो गईं। यहाँ यह लिखे बिना बात अधूरी ही रहेगी कि सुभद्रा के लिए स्वतन्त्र भारत का सपना सिर्फ सत्ता-सुख हासिल करने की लालसा से सम्बंधित नहीं था, उनके संघर्ष की बुनियाद में अपार राष्ट्रप्रेम का प्रबल वेग था। मसलन, सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटि तानी थी, बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी, गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी...बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।

Posted By: Ravindra Suhane

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