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सेवानिवृत्ति के बाद जाति प्रमाण-पत्र की जांच का औचित्य नहीं, एमपी हाई कोर्ट ने 21 साल पुराना आदेश किया निरस्त

वर्ष 2005 में एकलपीठ ने मामले को राज्य सरकार की हाई पावर कमेटी के समक्ष जांच के लिए भेजने का निर्देश दिया था। इसके खिलाफ महेंद्र सिंह ने अपील दायर की।

By Surendra DubeyEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Thu, 06 Aug 2026 10:58:25 PM (IST)Updated Date: Thu, 06 Aug 2026 11:02:12 PM (IST)
सेवानिवृत्ति के बाद जाति प्रमाण-पत्र की जांच का औचित्य नहीं, एमपी हाई कोर्ट ने 21 साल पुराना आदेश किया निरस्त
एमपी हाई कोर्ट।

HighLights

  1. - विभागीय जांच में प्रमाणपत्र मिला था वैध

नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाई कोर्ट ने जाति प्रमाणपत्र की वैधता को लेकर चल रहे विवाद में महत्वपूर्ण आदेश देते हुए 21 साल पुराने एकलपीठ के आदेश को निरस्त कर दिया।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया व न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने कहा कि जब संबंधित कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुका है।

विभागीय जांच में उसका जाति प्रमाणपत्र वैध पाया जा चुका है तो इतने लंबे अंतराल के बाद हाई पावर कमेटी से जांच कराने का कोई उपयोगी उद्देश्य नहीं रह जाता।

अपीलकर्ता मंडला निवासी महेंद्र सिंह ठाकुर की ओर से दलील दी गई कि अपीलकर्ता के खिलाफ अवैध जाति प्रमाण-पत्र के आधार पर नौकरी प्राप्त करने की शिकायत हुई थी।

वर्ष 2005 में एकलपीठ ने मामले को राज्य सरकार की हाई पावर कमेटी के समक्ष जांच के लिए भेजने का निर्देश दिया था। इसके खिलाफ महेंद्र सिंह ने अपील दायर की।

कोर्ट ने पाया कि विभिन्न विभागीय जांचों में महेंद्र सिंह को आरोपों से मुक्त किया गया तथा उनका जाति प्रमाणपत्र वैध पाया गया। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि हाई पावर कमेटी ने अब तक कोई जांच नहीं की।

इसके साथ ही सभी संबंधित पक्ष सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। ऐसे में जांच का आदेश कानूनन टिकाऊ नहीं है। कोर्ट ने 2005 का आदेश और 2008 का संबंधित आदेश दोनों निरस्त कर दिए।