
झाबुआ, नईदुनिया प्रतिनिधि। झाबुआ में पाया जाने वाला कड़कनाथ मुर्गा 15 राज्यों से होते हुए भाभा एटॉमिक रिसर्च इंस्टिट्यूट (बार्क) तक पहुंच गया है। इसके मांस को कितने दिनों तक प्रिजर्व रखा जा सकता है, यह जानने के लिए रायपुर के इंदिरा कृषि विश्वविद्यालय ने वहां के फूड एंड टेक्नोलॉजी विभाग को 25 कड़कनाथ भेज भी दिए हैं। इस काम में जुटे बार्क के वैज्ञानिक डॉ. एसपी चावला ने 'नईदुनिया को बताया कि कड़कनाथ पहली बार प्रोसेसिंग टेस्ट के लिए आया है।
अभी इसे ज्यादा से ज्यादा दो या तीन दिन तक ही फ्रिजर में रखा जा सकता है। हम रेडिएशन ट्रीटमेंट (बैक्टीरिया पनपने की गति बहुत धीमी कर देना) के जरिए इसकी सेल्फ लाइफ 15-20 दिन तक ले जाना चाहते हैं। फिलहाल आधा किलो चिकन पर ही इसका प्रयोग किया जा रहा है। परिणाम आने में 10-12 दिन लगेंगे। बेशक, वैज्ञानिक रूप से यह प्रयोग सफल रहा तो एक्सपोर्ट करना या लंबी दूरी वाली जगहों पर इसकी बिक्री का नया रास्ता खुल सकता है।
झाबुआ ...दो महीने की वेटिंग, 10 हजार चिक्स की मांग
भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र के जरिए झाबुआ में 2012 में शुरू हुए हेचरी प्रोजेक्ट से जुड़े डॉ. आरके यादव बताते हैं कि छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, यूपी, आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, गोवा सहित 15 राज्यों व मध्यप्रदेश के 23 जिलों में झाबुआ से कड़कनाथ सप्लाई किए जाते हैं। अभी भी दो महीने की वेटिंग है और 10 हजार चिक्स की मांग है। इसे संरक्षित करने का प्रोजेक्ट तो 2014 में पूरा हो गया। अब हम सिर्फ इसकी शुद्धता को बरकरार रखने में जुटे हैं।
फायदा
लो कैलोरी, हाई प्रोटीन : नेशनल रिसर्च सेंटर ऑफ मीट, हैदराबाद के मुताबिक कड़कनाथ कम कैलोरी और हाई प्रोटीन वाला है। बाजार में ताकत बढ़ाने वाले भोज्य पदार्थ के रूप में इसकी मांग बढ़ रही है।
चुनौती
महू वेटरनरी कॉलेज के डीन डॉ. मुकेश कुमार मेहता का कहना है कि कड़कनाथ साढ़े तीन-चार महीने में एक किलो का होता है। कम समय में जल्दी विकसित करने पर शोध किया जा रहा है। पैदावार में तेजी आने से इसकी लागत घटेगी।