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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Apr 06, 2024 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Lok Sabha Election: रतलाम में भूरिया vs भूरिया की लड़ाई रही दिलचस्प, एक ने कांग्रेस छोड़ी तो दूसरे को भोपाल छोड़ना पड़ा

झाबुआ में 1998 का लोकसभा चुनाव दो बड़ी पार्टियों के भूरिया प्रत्याशियों के बीच पहले दिलचस्प मुकाबले के लिए जाना जाता है। दिलीप सिंह भूरिया 1998 से इस ...और पढ़ें

By Neeraj PandeyEdited By: Neeraj Pandey
Publish Date: Sat, 06 Apr 2024 04:00:00 AM (IST)Updated Date: Sat, 06 Apr 2024 04:00:32 AM (IST)
Lok Sabha Election: रतलाम में भूरिया vs भूरिया की लड़ाई रही दिलचस्प, एक ने कांग्रेस छोड़ी तो दूसरे को भोपाल छोड़ना पड़ा
भूरिया विरुद्ध भूरिया की लड़ाई दिलचस्प रही

HighLights

  1. भूरिया विरुद्ध भूरिया की लड़ाई दिलचस्प रही
  2. एक के मन में भाजपा से सांसद बनने की इच्छा जागी
  3. दूसरे को सांसद पद के लिए मंत्री पद छोड़ना पड़ा

शवंतसिंह पंवार, झाबुआ। रतलाम-झाबुआ क्षेत्र की राजनीति में भूरिया विरुद्ध भूरिया की राजनीतिक लड़ाई दिलचस्प रही है। वर्षों दोनों के बीच एक-दूसरे को पछाड़ने की होड़ मची रही है। पहले जब दोनो कांग्रेस में रहे तो गुटबंदी चलती रही। जब अलग-अलग दल में बंट कर लड़ने लगे तो मुकाबला ही अलग तरह का हो गया। यह मुकाबला भी एक-दो साल नहीं बल्कि डेढ़ दशक से अधिक चला।

लड़ाई का केंद्र बना लोकसभा चुनाव

1996 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ कांग्रेस के ही बड़े नेताओं ने विश्वासघात किया तो दिग्गज सांसद दिलीप सिंह भूरिया का कांग्रेस से मोह भंग हो गया। दिल्ली में भी खींचतान चल रही थी। परिणाम यह रहा कि 1998 का लोकसभा चुनाव सांसद भूरिया ने भाजपा से लड़ने का मन बना लिया। जब वे भाजपा में गए तो कांग्रेस उनके टक्कर का नेता खोजने लगी। तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भोपाल के मंत्रालय का काम छुड़वाते हुए अपने कैबिनेट मंत्री कांतिलाल भूरिया को सांसद का चुनाव लड़ने के लिए झाबुआ भेजा। दोनो भूरिया में चुनावी जंग शुरू हुई।


दोनो को देना था संदेश

1980 से कांग्रेस के सांसद बनकर लोकसभा में बैठने वाले दिलीप सिंह भूरिया की इच्छा थी कि अब वे भाजपा के सांसद बनकर दिखाए। ताकि राजनीतिक संदेश यह जाए कि रतलाम-झाबुआ संसदीय सीट पर कांग्रेस नहीं बल्कि दिलीप सिंह भूरिया जीतता है। पार्टी उनके पीछे चलती है। उधर कांतिलाल भूरिया यह राजनीतिक संदेश देना चाहते थे कि कांग्रेस इस क्षेत्र में मजबूत है। किसी नेता के छोड़ने से कोई फर्क नहीं पड़ता है। चुनाव प्रचार के दौरान आरोप - प्रत्यारोप भी खूब चले।

एक साल बाद फिर चुनाव

1998 का लोकसभा चुनाव दो बड़ी पार्टियों के भूरिया प्रत्याशियों के बीच पहले दिलचस्प मुकाबले के लिए जाना जाता है। इस चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी कांतिलाल भूरिया को जीत मिली। दिल्ली जाने के लिए उन्हें प्रदेश का मंत्री पद छोड़ना पड़ा। एक साल बाद देश में चल रही राजनीतिक अस्थिरता के कारण फिर लोकसभा चुनाव हो गए। 1999 के चुनाव में दूसरी बार कांग्रेस व भाजपा ने फिर अपने भूरियाओं को प्रत्याशी बनाया। इस बार कांग्रेस के भूरिया बड़े अंतर से चुनाव जीत गए।

जितवाकर दिखा देना

फिर 2004 लोकसभा चुनाव आया तो भाजपा को अनुकूल वातावरण लगा। कारण यह था संसदीय सीट की आठ में से सात विधानसभा में भाजपा पहली बार अपने विधायक बना चुकी थी व चार माह पहले उसके हाथ भोपाल की सत्ता भी लग गई थी। भाजपा ने दिलीप सिंह भूरिया का टिकट काटते हुए झाबुआ की पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष रेलम चौहान को प्रत्याशी बना दिया। बताया जाता है कि उस समय टिकट कटने से नाराज दिलीप सिंह भूरिया ने भोपाल में तत्कालीन भाजपा प्रदेशाध्यक्ष कैलाश जोशी को यह कह दिया था कि अब चुनाव जितवाकर दिखा देना।हुआ भी यही, कांग्रेस प्रत्याशी कांतिलाल भूरिया वातावरण अनुकूल नहीं होने के बावजूद चुनाव जीत गए।

घूमकर फिर आए

2004 के बाद दिलीप सिंह भूरिया ने भाजपा छोड़कर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का दामन थाम लिया। कुछ दिन बाद वापस कांग्रेस में आ गए। अगले चुनाव के पहले घूमकर फिर भाजपा में आ गए। 2009 का लोकसभा चुनाव फिर दो भूरियाओ के बीच लड़ा गया। परिणाम कांग्रेस के पक्ष में रहा।