
-चारों पर 16-16 हजार रुपए का जुर्माना
- 30 जुलाई 14 की रात बाइक सवार की कर दी गई थी हत्या, चार दिन तक शहर में लगा रहा था कर्फ्यू
खंडवा। नईदुनिया प्रतिनिधि
सुशील पूंडगे हत्याकांड में गुरुवार को फै सला दिया गया। विशेष अपर सत्र न्यायाधीश सुरेंद्र कु मार श्रीवास्तव ने चार युवकों को मरते दम तक सलाखों के पीछे रहने की सजा सुनाई है। 16-16 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है। मामले की पैरवी अभियोजन अधिकारी एमएल सोलंकी ने की है। मामला मोघट थाना क्षेत्र का है। चारों हत्यारों ने माथे पर तिलक देखकर सुशील की हत्या कर दी थी। इस घटना के बाद शहर में साम्प्रदायिक तनाव फै ल गया था। 4 दिन तक शहर में कर्फ्यू लगा था।
जिला अभियोजन मीडिया प्रभारी हरिप्रसाद बांके ने बताया कि 30 जुलाई 2014 को रात करीब 9 बजे इमलीपुरा मार्ग पर शर्मा गैरेज के सामने हातमपुरा से सुशील कु मार पूंडगे निवासी नर्मदापुरम कॉलोनी बाइक से जा रहा था। जाकि र, मोहम्मद आजम, जियाउलहक और जुबरे ने उसे रोक लिया। उसके माथे पर तिलक लगा हुआ देखकर आरोपितों ने उसे धर्म को लेकर गालियां दी। सुशील को घेर कर उस पर चाकू से वार कर दिए। काफी देर तक वह उनके बीच पड़ा रहा। इसके बाद चारों उसे छोड़कर भाग गए। गंभीर हालत में पुलिस ने सुशील को जिला अस्पताल में भर्ती कराया था। यहां उसकी मौत हो गई थी।
इन्हें हुई है सजा
मोहम्मद आजम पिता मोहम्मद इकबाल निवासी लक्कड़ बाजार, जियाउलहक पिता अलामुद्दीन निवासी धनगर मोहल्ला, मोहम्मद जाकि र पिता मोहम्मद सलीम निवासी कल्लनगंज और जुबेर पिता शकील निवसी गुलमोहर कॉलोनी को सजा दी गई है। सभी को आखिरी सांस तक जेल में रहना होगा।
हत्या के बाद बनी थी तनाव की स्थिति
सुशील की हत्या की खबर शहर में फै लते ही तनाव की स्थिति बन गई थी। हिंदू संगठन के पदाधिकारी और शहर के लोगों ने घटना का विरोध कि या था। करीब 4 दिन तक शहर में कर्फ्यू लगा रहा। इसके बाद ही हालात सामान्य हो पाए थे। हत्यारों की गिरफ्तारी को लेकर पत्नी मीना पुंडगे और हिंदू संगठन के पदाधिकारियों ने घंटाघर पर धरना दिया था।
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कोर्ट के फै सले का सम्मान
फै सले को लेकर सुशील पुंडगे की पत्नी मीना ने मीडिया से कहा कि सुशील का कि सी से कोई विवाद नहीं था। वह अपना काम कर घर लौट रहे थे। इस दौरान उनकी बेहरमी से हत्या कर दी। उसका परिवार पूरी तरह से बिखर गया। जैसे-तैसे वह गुजर बसर कर रही है। हत्यारों को फांसी की सजा ही होना चाहिए थी। फांसी से कम कु छ भी गवारा नहीं है लेकि न लेकि न कोर्ट की फै सले का सम्मान करती हूं। एक महिला को कोर्ट से न्याय मिला है।