By Hemant Kumar Upadhyay
Edited By: Hemant Kumar Upadhyay
Publish Date: Thu, 04 May 2023 10:52:09 PM (IST)
Updated Date: Thu, 04 May 2023 10:52:09 PM (IST)
Khargone News मंगलम पंवार, झिरन्या (खरगोन)। पिछले एक दशक तक सीमावर्ती महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की सीमा रेखा खींचने वाले सतपुड़ा अंचल की मैंकल श्रेणियां हरे भरे वृक्षों से आच्छादित रहती थी। लेकिन अब दूर दूर तक नजर दौड़ाने पर भी घने वनों के स्थान पर छितरे हुए वन दिखाई देते हैं।
इनमें गोंद देने वाले धावड़ा, सलाई के वृक्ष कहीं-कहीं ही बचे हैं। जबकि कुल्लू, खैर आदि के वन लगभग पूरी तरह विलुप्त हो गए हैं। यही स्थित अधिक गोंद के लिए रासायनिक इंजेक्शन के उपयोग से निर्मित हुई है, जो मानव जीवन के स्वास्थ्य के प्रतिकूल है। जबकि पर्यावरण एवं वन्य प्राणियों के लिए भी उक्त प्रक्रिया मुसीबत बन गई है।
भौगोलिक रूप से मध्य प्रदेश की सीमा दक्षिण में महाराष्ट्र से, पश्चिम में गुजरात से, पूर्व में बुरहानपुर, खंडवा, पश्चिम में बड़वानी जिले से और उत्तर में देवास, इंदौर एवं सीमावर्ती जिलों तक फैली हुई है। इन क्षेत्रों में कभी बबूल धावड़ा, सलाई, खैर कुल्लू आदि गोंद देने वाले वृक्षों की बहुलता थी।
इसलिए प्राकृतिक रूप से निकलने वाले जैविक गोंद की गुणवत्ता पौष्टिक और सौंदर्य प्रसाधन एवं सुगंधित अगरबत्ती, गूगल आदि भी स्वास्थ्य के अनुकूल होते थे। इन दोनों ही स्थितियों में उक्त अजैविक गोंद स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक हानिकारक है। डीएफओ खरगोन प्रशांत कुमार सिंह ने बताया कि इंजेक्शन से गोंद की प्रक्रिया अपराध की श्रेणी में है। इसलिए भारत सरकार ने ड्रग्स एवं कास्मेटिक एक्ट में लैबोरेट्री टेस्ट का प्रावधान किया है।
गर्मी में मिलने लगता है गोंद
जैसे ही दिसंबर में सूरज के तेवर तीखे होने लगते हैं, वैसे ही वृक्षों पर गोंद का धीरे-धरे निकलना शुरू हो जाता है और यह सिलसिला जून माह तक चलता है। कस्बा पाल के फुटकर दुकानदार गब्बू भाई तड़वी ने बताया कि इस वर्ष अचानक बारिश एवं ओलावृष्टि से मौसम परिवर्तन से ठंडक बनी हुई है। इस स्थिति में इंजेक्शन से भी गोंद नहीं निकल पा रहा है। इस वर्ष धावडे और सलाई गोंद की गुणवत्ता अधिक खराब हो गई है और पिछले वर्षों की तुलना में इनका उत्पादन घटकर लगभग 40% से 50% तक ही रह गया है।
प्रशिक्षण के बाद बिगड़े हालात
गौरतलब है कि जैविक प्रक्रिया से बहुत कम गोंद प्राप्त होता है और यह व्यवसायिक दृष्टि से लाभदायक नहीं है। इसलिए वन क्षेत्रों में रासायनिक इंजेक्शन से अधिक गोंद प्राप्त करने की प्रतिस्पर्धा है। इसी श्रृंखला में सीमावर्ती यावल प्राणी अभ्यारण पाल (जलगांव) द्वारा करीब 7-8 वर्ष पूर्व वनवासियों की आय बढ़ाने के लिए उक्त प्रक्रिया का प्रशिक्षण दिया गया था। जिससे सीमावर्ती सतपुड़ा पर्वत की गोद में बसे दोनों ही प्रांतों के गांवों में इंजेक्शन का प्रचलन बढ़ गया और वन बर्बादी की कगार पर पहुंच गए। यदि उक्त सिलसिला कुछ वर्षों तक और भी जारी रहा तो वनों के स्थान पर केवल पहाड़ियां ही नजर आएगी।
इंजेक्शन से ऐसे निकालते हैं गोंद
इस प्रक्रिया में कुल्हाड़ी से वृक्षों का ऊपरी छिलका निकाल कर, उसमें केमिकल की कुछ बूंदे डालते हैं। इसे ही इंजेक्शन लगाना कहते हैं। इससे दो-तीन दिनों में फिर से गोंद निकल आता है। लेकिन इस प्रक्रिया की बार-बार पुनरावृति और अधिक गहराई तक वृक्षों को छीलने से उनमें जहर फैल जाता है। लेकिन इससे बेखबर वनवासी प्रति व्यक्ति ढाई सौ ग्राम से लेकर एक किलो अजैविक गोंद निकाल कर आजीविका चलाते हैं। वहीं दूसरी ओर वृक्षों की पत्तियां और गोंद भी जहरीला हो जाता है। जो मानव जीवन,वन्य पशु पक्षी और पालतू पशुओं के लिए भी हानिकारक है।
अभ्यरण्यों के वन्य प्राणी भी प्रभावित
दोनों प्रांतों की सीमा को विभक्त कर रहे सतपुड़ा पर्वत अंचल की दक्षिणी सीमा में यावल (जलगांव) और मेल वन्य प्राणी अभ्यारण (मुक्तई नगर) आते हैं। इनकी सीमा क्रमशः खरगोन, बड़वानी और बुरहानपुर वन मंडल से सटी हुई है। इसलिए दोनों प्रांतों में प्राणी विचरण करते हैं। इसलिए दोनों ही अभयारण्य और सतपुड़ा पर्वत एवं वनों में रहने वाले सभी वन्य पशु पक्षियों के जनजीवन के लिए भी उक्त स्थिति चिंताजनक है।
महाराष्ट्र में कोई प्रतिबंध नहीं
इन गंभीर हालातों के बावजूद महाराष्ट्र में पेसा एक्ट के तहत वन समितियों को गोंद संग्रहण, क्रय विक्रय और परिवहन पास जारी करने की अनुमति है। इसलिए मध्य प्रदेश की सीमा से सटे करीब एक डेढ़ दर्जन गांव के लोग स्थानीय अथवा महाराष्ट्र में कम कीमतों में ही विक्रय कर देते हैं। यही अवैध रूप से संग्रहित गोंद, महाराष्ट्र की वन समिति की टीपी से परिवहन करता है और अवैध गोंद भी वैध होकर देश विदेश में पहुंच जाता है। शासन की इस विसंगति पूर्ण नीतियों से वन माफिया लाखों रुपयों का कारोबार कर रहे हैं।
रिकार्ड संधारण भी नहीं कर पाते
सीमा पर स्थित वनोपज जांच चौकी द्वारा केवल चेकिंग होती है और कस्बा पाल की ग्राम पंचायत का टीपी होने से हम कोई कार्रवाई और रिकार्ड संधारण भी नहीं कर पाते है।
-पीयूष कुमार चौधरी, वन परिक्षेत्र अधिकारी तितरानियां (झिरन्या)
अनुकूल वातावरण नहीं मिल रहा
इंजेक्शन से गोंद निकालने से दोनों प्रांतों के जंगल बड़ी तेजी से खत्म हो रहे हैं। जिससे वन्य पशु पक्षियों को अपेक्षित छांव और अनुकूल वातावरण नहीं मिल रहा है और वे परेशान हैं। वहीं पर्यावरण संतुलन बिगड़ने से बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि की घटनाएं अत्यधिक गंभीर है।
-संजय उत्तम पवार, वन, वन्य जीव एवं पर्यावरण प्रेमी, पाल (महाराष्ट्र)
रात में लगाते हैं इंजेक्शन
सभी वन कर्मी दिन में जंगलों का भ्रमण करते हैं। लेकिन कोई नहीं मिलता है और हम गांव में जाकर लोगों को समझाइश देते हैं। फिर वे भी रात में वृक्षों में इंजेक्शन लगाकर,चोरी छुपे गोंद निकालते हैं।
-प्रशांत कुमार वाणी, बीट प्रभारी सुलाबेड़ी सब रेंज गाड़गियाआम (मध्य प्रदेश)
जांच-पड़ताल कर देंगे जानकारी
मध्य प्रदेश सीमा में वन कम होने से भेड़िया भटक कर मध्यप्रदेश में आया और कई लोगों पर हमले किए। अभ्यारण में कौन सा क्षेत्र गोंद देने वाले वृक्षों है और मैं इसकी जांच पड़ताल के बाद ही जानकारी दे पाऊंगा।
-अमोल चौहान, रेंजर, यावल वन्य प्राणी अभ्यारण पाल (महाराष्ट्र)
प्राकृतिक रूप से जैविक और रासायनिक प्रक्रिया में इथोफोन के उपयोग से अजैविक गोंद प्राप्त होता है। यह असंवाहनीय और अप्राकृतिक प्रक्रिया है। इसलिए वृक्ष भी जहरीले होकर 3 से 5 साल में नष्ट हो जाते हैं।
-श्रीनिवास मूर्ति, सेवानिवृत्त सदस्य सचिव, मध्य प्रदेश जैव विविधता बोर्ड भोपाल