खरगोन (नईदुनिया प्रतिनिधि)। स्वच्छ भारत मिशन के तहत खुले में शौच मुक्त अभियान के अंतर्गत शौचालय निर्माण किए गए। इसका फायदा गांवों में प्रवेश करते ही देखने को मिलने लगा है। अब गांवों के भीतर जल स्रोत के आसपास जो कीचड़ दिखाई दे रहा है। उसको लेकर ओडीएफ प्लस में गांव के भीतर जंग जीतने की तैयारी प्रारंभ हो चुकी है। इसके लिए जिला पंचायत के तकनीकी दलों को शुक्रवार को प्रशिक्षित किया गया। भोपाल से वाटरएड संस्था के चेतन अत्रे और सौरभ खंडेलवाल ने नवीन कलेक्टर सभागृह में प्रशिक्षण दिया। अत्रे ने बताया कि लिक्विड वेस्ट में ग्रे, यलो, ब्लेक और कमर्शियल वेस्ट वाटर है। ग्रे वाटर किचन वाटर, बाथरूम, क्लाथ और अन्य वस्तुओं की साफ सफाई करने से बहकर जाता है। ब्लेक वाटर इंसान और वातावरण को नुकसान पहुंचाने वाला वेस्ट होता है। यलो मलमूत्र और ढाबा, रेस्टोरेंट, अस्पताल, स्लाटर हाउस आदि से निकलता है। इसी वेस्ट वाटर को ट्रीट करने की विधियों के बारे में प्रशिक्षण दिया गया। साथ ही इन सभी संरचनाओं की तकनीक और कार्यों के सिद्धांत के बारे में विस्तार से समझाया गया। इस सभी संरचनाओं के साथ ही ग्रामीण जनता को पानी के रखरखाव के बारे में जागरूक करने पर भी योजना बनी है।
सामुदायिक संरचनाओं का बताया महत्व
अत्रे ने बताया कि एक स्टडी के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों के निवासी कुएं, ट्यूबवेल या हैंडपंप से घरों में पानी का उपयोग करते हैं। पानी के उपयोग के बाद पानी ग्रे वाटर बनकर नदी या नालों में मिल जाता है। इसी पानी को जमीन में उतारने की दिशा में प्रयास शुरू हुए हैं। इसके लिए व्यक्तिगत रूप से घरों के पास ही सिल्ट चेंबर बनाकर कार्य किया जा रहा है। इसी सिल्ट चेंबर की बनावट, आवश्यकता और इसको बेहतर रूप से उपयोगी बनाए। इस पर प्रशिक्षण में जोर दिया गया। विशेष तौर पर इसकी तकनीक मुख्य केंद्र पर रही। साथ ही ग्रे वाटर को रिड्यूस, रीयूज और रिचार्ज करने के तौर तरीके बताए गए। इनमें सामुदायिक संरचनाएं भी शामिल है। प्रशिक्षण के बाद जिले के तकनीकी दलों का फील्ड विजिट भी भोपाल के अधिकारियों के साथ कराया गया। प्रशिक्षण में जिला पंचायत सीईओ दिव्यांकसिंह, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी की कार्यपालन यंत्री मंजू सिंह आदि मौजूद थे।