अमित भटोरे/अभय तिवारी, महेश्वर/खरगोन। ओंकारेश्वर में आदि गुरु शंकराचार्य की प्रतिमा निर्माण के लिए निकाली जा रही एकात्म यात्रा के दौरान महेश्वर भी सुर्खियों में है। महेश्वर वही स्थल है, जहां कदंब वन में आदि गुरु शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच ऐतिहासिक शास्त्रार्थ हुआ था।
आज भी शास्त्रार्थ स्थल पर चरण पादुकाएं मौजूद हैं। दावा है कि आदि गुरु ने जिस स्थान पर अपना शरीर रखकर सूक्ष्म रूप धारण किया था, वह स्थान भी इसी नगर में है। आज भी ये ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल प्रासंगिक है। लोगों का कहना है कि इन धार्मिक स्थलों को संरक्षित और प्रचारित करने की जरूरत है। विद्वान मंडन मिश्र, विदुषी शारदा भारती, आद्य शंकराचार्य क्षेत्र सेवा संस्थान से जुड़े एडवोकेट जितेंद्र नेगी ने बताया कि फाल्गुन शुक्ल द्वितीय 2640 युधिष्ठिर संवत को शंकराचार्य शिक्षा के लिए नर्मदा तट ओंकारेश्वर पहुंचे।
वहां गुरु गोविंदपाद से उन्होंने शिक्षा ली। शुक्ल दसवीं 2647 युधिष्ठिर संवत को प्रयाग काशी के संगम पर शंकराचार्य और आचार्य कुमारिल भट्ट से मिलने के बाद शंकराचार्य महेश्वर में नर्मदा तट स्थित मंडन मिश्र के निवास पर पहुंचे। शंकराचार्य ने मंडन मिश्र से कहा कि वे विषाद रूप भिक्षा लेने के लिए उनके पास आए हैं। महर्षि व्यास व जैमिनी ऋषि की आज्ञा से दोनों के बीच शास्त्रार्थ के लिए समय तय किया गया।
महेश्वर में मंडन मिश्र का घर, जिसे मंडाल खो के नाम से जाना जाता है।
मंडन मिश्र की पत्नी उभय भारती देवी ने शास्त्रार्थ के दौरान मध्यस्थ पद ग्रहण किया। शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच 21 दिनों तक शास्त्रार्थ चला। दोनों ने अपने-अपने पक्षों की सिद्धि के लिए बहुत से तर्क व प्रमाण दिए, परंतु अंत में शंकराचार्य ने मंडन मिश्र को निरुत्तर कर शास्त्रार्थ में परास्त कर दिया।
महेश्वर में स्थित शास्त्रार्थ व ब्रह्मलोक गमन स्थल जिसका जीर्णोद्धार किया गया है।
पति की पराजय पर भारती देवी ने किया शास्त्रार्थ
इसके बाद मंडन मिश्र की पत्नी उभय भारती देवी ने शंकराचार्य से कहा कि उन्होंने अब तक पूरी जीत दर्ज नहीं की, क्योंकि वे मंडन मिश्र की अर्धांगिनी हैं, इसलिए भारती देवी से जीतने के बाद ही उन्होंने मंडन मिश्र को शिष्य बनाने की बात कही। इसके बाद शंकराचार्य व भारती देवी के बीच शास्त्रार्थ हुआ। इस दौरान भारती देवी ने शंकराचार्य से काम शास्त्र से संबंधित प्रश्न किया। चूंकि शंकराचार्य अविवाहित थे, इसलिए उन्होंने इस प्रश्न के उत्तर के लिए कुछ समय मांगा और वहां से चले गए।
महेश्वर में स्थित शास्त्रार्थ व ब्रह्मलोक गमन स्थल जिसका जीर्णोद्धार किया गया है।
महेश्वर के पश्चिम दिशा की गुफा में छोड़ा था शरीर
दावा है कि शंकराचार्य ने महेश्वर के पश्चिम दिशा स्थित एक गुफा में अपना शरीर छोड़ा और शिष्यों को वहां रुकने के लिए कहा। सूक्ष्म रूप धारण कर वे आकाश में भ्रमण करने लगे। इस दौरान उन्होंने राजा अमरूक के मृत शरीर को देखा, जिसके आसपास 100 से अधिक सुंदरियां विलाप कर रही थीं।
तब शंकराचार्य ने सूक्ष्म रूप के साथ राजा के शरीर में प्रवेश किया। राजा को जीवित देख रानियां व मंत्री प्रसन्न् हो गए। राजा ने पुन: काम संभाला और इसी दौरान काम शास्त्र से संबंधित तथ्यों को जाना और पुन: राजा अमरूक के शरीर को छोड़कर गुफा में पहुंचे और अपने मूल शरीर में प्रवेश कर मंडन मिश्र के घर पहुंचे। वहां उभय भारती व शंकराचार्य के बीच पुन: शास्त्रार्थ हुआ। इसमें शंकराचार्य ने उभय भारती को पराजित किया।
मंडलाखोर के नाम से जाना जाता है
नेगी ने बताया कि मंडन मिश्र व शारदा भारती का निवास क्षेत्र, तपोभूमि क्षेत्र और ब्रह्मलोक गमन क्षेत्र का उल्लेख श्री शंकर दिग्विजय व क्षेत्र की भौगोलिक दृष्टि से महेश्वर में है। मंडन मिश्र के निवास स्थान नर्मदा किनारे स्थित इस क्षेत्र को मंडलाखोर के नाम से जाना जाता है। शास्त्रार्थ क्षेत्र महिष्मति व नर्मदा नदी के संगम पर सातमाता मंदिर के उत्तर दिशा में स्थित है। इसे कदंब वन क्षेत्र कहा जाता है। वर्तमान में कदंबेश्वर शिवालय स्थित है।
शास्त्रार्थ क्षेत्र तात्कालिक समय में कदंब वृक्षों से आच्छादित रहा है। वर्तमान में यहां एक कदंब का वृक्ष स्थित है। जिस गुफा में शंकराचार्य ने अपना शरीर छोड़कर सूक्ष्म रूप धारण किया, वह गुफा वर्तमान में दंडी स्वामी की गुफा के नाम से जानी जाती है। सन् 1872 में नगर के समाजसेवी व दानदाताओं ने देवी शारदा भारती की स्मृति में नगर के बाजार चौक में शारदा सदन ग्रंथालय की स्थापना की। शासन के सहयोग से शास्त्रार्थ भूमि क्षेत्र तथा ब्रह्मलोक गमन स्थान का जीर्णोद्धार कर चरण पादुकाओं का प्रतिष्ठापन किया गया है।
संत समाज में शंकराचार्य का स्थान सर्वोपरि
संत समाज में शंकराचार्य का स्थान सर्वोपरि है। सनातन धर्म की पुनर्स्थापना का श्रेय शंकराचार्यजी को ही जाता है। उन्होंने चार धाम की स्थापना की थी। शंकराचार्य और मंडन मिश्र का शास्त्रार्थ प्राचीन माहिष्मति वर्तमान में महेश्वर में ही हुआ था। जब बनारस काशी में कुमारिल भट्ट आत्मग्लानि के कारण आत्मदाह कर रहे थे, तब उन्होंने ही शंकराचार्य को माहिष्मति यात्रा का आदेश दिया था। मंडन मिश्र के निवास स्थान के पास में तोता और मैना संस्कृत में शास्त्रार्थ करते थे। यही उनके निवास स्थान की पहचान थी। मंडाल खो मंडन मिश्र का निवास स्थान और कदंब वन शास्त्रार्थ स्थली रहा है।
-संत हृदयगिरि महाराज, जगन्नाथ मंदिर महेश्वर
22 जनवरी को प्रतिमा स्थापना के लिए होगा भूमिपूजन
एकात्म यात्रा से जुड़ी चार यात्राएं 21 जनवरी को ओंकारेश्वर पहुंचेंगी। यहां 22 जनवरी को आदि गुरु शंकराचार्य की प्रतिम स्थापना के लिए भूमिपूजन होगा। आयोजन में सीएम शिवराजसिंह चौहान का आना तय है। साथ ही प्रधानमंत्री को लाने के प्रयास के लिए जा रहे हैं।