
मंडला। कभी हिरदेनगर की पहचान पान बरेजों के रूप में की जाती थी। जिले में मंडला पत्ती के नाम से बिकने वाले पान की यह पहचान अब करीब-करीब समाप्त होने की कगार पर है। प्रशासन की उपेक्षा और संसाधनों की कमी के चलते अब पान बरेज अंगुलियां पर गिने सकते हैं।
एक जमाने में हिरदेनगर में पान बरेजे एक लघु उद्योग के रूप में विकसित था। धीरे धीरे संसाधनों की कमी होती गई और लोग इस काम से दूरी बनाने लगे। जहां तीन दशक पूर्व करीब 500 से अधिक पान बरेजे हुआ करते थे।
अब बमुश्किल से दो बचे हैं। सरकारी उपेक्षा से ये लोग भी हतोत्साहित होने लगे हैं।
नहीं मिल रहा बांस,बकोड़ाइस पेशे जुड़े लोगों ने बताया कि सामान न मिलने से पान बरेजे लगाने में पेशानियों का सामना करना पड़ता है। बांस वन विभाग के माध्यम से मिलने बंद हो गए हैं। जैसे- तैसे जुगाड़कर बांस मंगाए जाते हैं लेकिन वह ज्यादा मजबूत नहीं होते। बकौड़ा (छिवला की जड़ से बनी रस्सी) कहा जाता है वह भी अब आसानी से नहीं मिलता। पहले गांव के लोग स्वयं इसे लेकर आते थे। लेकिन वन विभाग की रोक के बाद अब यह भी मिलना कठिन हो गया है। इसके साथ ही इस क्षेत्र में काम करने वाले मजदूर भी नहीं मिल रहे।
स्थानीय स्तर से बने योजना
पान बरेजे लगाने वाले रामनारायण चौरसिया की मानें तो जो योजना बने वह स्थानीय स्तर से बने। पहले भी जो नई स्कीमें आई। वे यहां के लिए मुफीद साबित नहीं हुई। यहां पर नई स्कीम के तहत जो नेट सिस्टम दिया गया। वह कारगर साबित नहीं हुआ।उन्होंने बताया कि गतवर्ष तूफान आने से पान बरेजा नष्ट हो गया। लेकिन शासन से केवल 12 सौ रुपये की राशि मिली। बरेजे लगाने में हजारों रुपये लगते हैं और सहायता राशि सैकड़ों में मिलती है। यही कारण है कि लोगों का रूझान अब इस ओर नहीं रह गया है। लोग दूसरे रोजगार की ओर बढ़ रहे हैं। सीएम हाल ही में कह गए है कि स्थानीय स्तर से ही योजना बनाई जाए। यदि अमल किया जाए तो शायद बरेजों को फिर से बचाया जा सकता है।
मंडला पत्ती के नाम से बिकता था पान
हिरदेनगर का पान शहर में मंडला पत्ती के नाम से ही बिकता था। अब भी इस पत्ती के शौकीनों की कमी नहीं है। हिरदेनगर से जैसे ही पान शहर आता है। कुछ ही देर में ही बिक जाता है। पान विक्रेता प्रशांत चौरसिया ने बताया कि उनके पास तो देशी पान नहीं है। वे तो शहर में बंगला व मीठी पत्ती ही बेचते हैं। लेकिन हिरदेनगर से जब मीना बाई पान लेकर आती है तो चंद मिनटों में ही उनका पान बिक जाता है।
सहायता राशि बढ़ाई जाए
पान बरेजे लगाने वाले स्थानीय जनों का कहना है कि स्थानीय स्तर पर बरेजे लगाने संसाधन उपलब्ध कराए जाएं। इसके साथ ही नुकसानी होने पर सहायता राशि बढ़ाई जाए। तो ही इसे पुर्नजीवित किया जा सकता है। वरना बरेजों को बचाए रखना मुश्किल हो जाएगा।