
आलोक शर्मा, नईदुनिया, मंदसौर : मंदसौर जिला पुरा संपदा में भी काफी समृद्ध है। यहां कई ऐतिहासिक प्रतिमाएं भी निकली है और देश के कई संग्रहालयों में भी है। वहीं कई प्रतिमाएं मंदसौर जिले में भी है। यहां अद्भुत प्रतिमाओं में शामिल है विश्व की एकमात्र 12 फीट 6 इंच ऊंची परसुधारी शिव की प्रतिमा भी मंदसौर के जिला न्यायालय परिसर में स्थापित है।
इसका निर्माण 1500 साल पहले गुप्त औलिकर काल में हुआ था। इस प्रतिमा को भी मुस्लिम आक्रांताओं ने किले की दीवार में चुनवा दिया था जिसे 1926 में निकाला गया, तबसे यह जिला न्यायालय परिसर में ही स्थापित है।
गुप्त औलिकर काल (4-6 शताब्दी ईस्वी) में निर्मित प्रतिमा तत्कालीन भारत की सबसे विशाल 12 फीट 6 इंच (3 मीटर 81 सेमी) ऊंची प्रतिमा थी। परसुधारी शिव प्रतिमा के हाथों में शिव ने अनेक आयुध धारण कर रखे हैं इनमें त्रिशूल, भिक्षापात्र, खटवांग आदि महत्वपूर्ण है।
परसुधारी शिव की पूरे भारत में एकमात्र प्रतिमा मंदसौर में हैं। पुरातत्वविद कैलाशचंद्र पांडेय ने बताया कि प्रतिमा 13 वीं शताब्दी तक प्राचीन दशपुर (मंदसौर) में किसी देवालय में प्रतिष्ठित थी। इसके बाद आए मुस्लिम आक्रांताओं ने इसे खंडित कर किले की दीवार में चुन दिया था।
1926 में अंग्रेज पुरात्वविद बीडी ट्यूनर को किले के दक्षिणी भाग में उत्खनन के दौरान यह प्रतिमा दिखी। तब ग्वालियर राज्य के पुरातत्व अधिकारी एमबी गद्रे भी सौंधनी के विजय स्तंभ को व्यवस्थित करने में लगे थे। गद्रे ने इस प्रतिमा की पीदिका का निर्माण कर तत्कालीन सूबा कार्यालय के सामने स्थापित कराया।
अलंकृत जटा मुकुट, त्रिनेत्र वाली प्रतिमा के दाहिने हाथ में अपसूत्र व बायें हाथ में विशाल परसु धारण किए हुए है। प्रतिमा के दाएं-बाएं पुष्पा घाटी व त्रिशुल पुरुष का अंकन है। शिव के आयुध पुरुषों का अंकन गुप्त काल में प्रारंभ हो गया था। मंथना कुढार व दशपुर में कलाकारों ने यह प्रयोग किया है।
भारतीय प्रतिमा विज्ञान में त्रिशूल सह फरसे वाली संभवतः एकमात्र प्रतिमा है। प्रतिमा की प्रभावली में ऊपर से नीचे दाएं-बाएं 6-6 शिव गणों का अंकन था प्रतिमा का दाहिना भाग क्षतिग्रस्त होने के कारण बांयी तरफ के नष्ट हुए शिवगणों की कल्पना की जा सकती है। लगभग 30 साल पहले तत्कालीन कलेक्टर पीएस तोमर ने इसे सुरक्षित रखने के प्रतिमा के ऊपर पतरों का शेड बनवाया।
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