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मंदसौर में काले सोने अफीम की खेती की लागत बढ़ी, किसानों को दाम मिल रहे पुराने

अंग्रेजों के शासनकाल में मंदसौर क्षेत्र और इससे सटे राजस्थान के चित्तौड़, कोटा, प्रतापगढ़ व झालावाड़ में अफीम की खेती शुरू की गई थी।

By Alok SharmaEdited By: Prashant Pandey
Publish Date: Mon, 05 Oct 2026 02:21:07 PM (IST)Updated Date: Mon, 05 Oct 2026 02:32:55 PM (IST)
मंदसौर में काले सोने अफीम की खेती की लागत बढ़ी, किसानों को दाम मिल रहे पुराने
अफीम के डोडे से इस तरह निकलती है अफीम। .अफीम के खेत को किसान चारों तरफ से सुरक्षित रखते हैं। फाइल फोटो

HighLights

  1. घाटे में भी कर रहे खेती, नई अफीम नीति में मांग सुने जाने की उम्मीद
  2. गांवों में इज्जत का प्रतीक अफीम पट्टा, नहीं छोड़ना चाहते किसान
  3. दस साल बाद भी किसानों को मिल रहे 850 से 3500 रुपये किलो तक दाम

आलोक शर्मा, नईदुनिया, मंदसौर। मंदसौर संसदीय क्षेत्र में अफीम के पट्टे, औसत और उसके दाम को लेकर काफी हद तक चुनाव प्रभावित होते रहे हैं। हर बार लोकसभा के चुनावी घोषणा पत्र में अफीम की सरकारी खरीद में दाम 10 हजार रुपये किलो तक कराने का वादा किया जाता है। पर 17 साल से भी ज्यादा समय होने के बाद भी दाम में एक रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी नहीं की गई है।

अब एक बार फिर केंद्र सरकार नई अफीम नीति घोषित करने वाली है तो किसानों की आस जगी है कि कुछ तो दाम बढ़े। आठ साल पहले सांसद सुधीर गुप्ता ने गांवों में किसानों से कहा था कि अफीम खरीदी के दाम न्यूनतम पांच हजार रुपये किलो तक हो गए हैं। उस समय किसानों ने गांव-गांव में स्वागत कर मालाएं भी पहनाई थी पर अभी भी किसानों के लिए न्यूनतम 850 रुपये से अधिकतम 3500 रुपये किलो तक के ही दाम तय हैं। हालांकि, किसानों को औसत 1100 से 1800 रुपये किलो का ही भुगतान होता हैं, जबकि लागत बढ़कर डेढ़ लाख रुपये तक पहुंच गई है।


मंदसौर-नीमच जिलों में अफीम काश्तकारों के नाम पर खूब राजनीति होती है। केंद्र के सत्ताधारी दल के जनप्रतिनिधि पट्टे के रकबे और अफीम के दाम को लेकर किसानों के सामने दावे भी करते हैं। लंबे समय तक क्षेत्र से सांसद रहे डॉ. लक्ष्मीनारायण पांडेय, पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन भी समय-समय पर अफीम नीति में परिवर्तन कराने के साथ ही दाम बढ़ाने के भी वादे करते रहे पर दाम वहीं के वहीं रहे।

वर्तमान सांसद सुधीर गुप्ता इन सबसे आगे निकल गए थे। जनवरी-फरवरी 2017 में बही पार्श्वनाथ फंटे पर अफीम किसानों के धरने पर जाकर घोषणा की थी कि अब सरकार अफीम के दाम पांच हजार रुपये प्रतिकिलो देगी। इससे किसान भी खुश हुए और सांसद का कई गांवों में स्वागत कर साफे भी बांधे।

हालांकि, उसके बाद नौ साल हो गए हैं। हर साल अफीम की तुलाई हो रही है पर केंद्र सरकार ने न्यूनतम 850 रुपये से अधिकतम 3500 रुपये प्रतिकिलो के दाम ही तय कर रखे हैं पर किसानों को औसत दाम 1100-1200 रुपये प्रतिकिलो ही मिल रहे हैं।

जब पट्टे मार्फीन के आधार पर तो दाम अफीम पर क्यों

संतोष पाटीदार बालागुड़ा, पुष्कर पाटीदार, रामेश्वर शर्मा, बद्रीलाल धनगर, राहुल पाटीदार दलौदा रेल, शांतिलाल पाटीदार धमनार, राधेश्याम पाटीदार दलौदा रेल, अनिल शर्मा जवासिया, राजेश शर्मा जवासिया, राजेश पाटीदार ने बताया कि विभाग द्वारा मार्फीन के प्रश को आधार मानकर पट्टे दिए जा रहे हैं जबकि मूल्य देते समय अफीम की गाढ़ता को आधार मान रहे हैं।

जब मार्फीन का आधार मानकर लाइसेंस दिये जा रहे हैं तो किसानों को उपज का मूल्य भी इसी आधार पर दिया जाना चाहिए। उच्च क्वालिटी की अफीम के भाव 3500 रुपये आज तक किसी किसान को नहीं दिए गए हैं। यह केवल दिखावा मात्र है। किसानों को उच्च क्वालिटी की अफीम के 1460 रुपये से लगाकर 1800 रुपये तक का भुगतान किया जा रहा हैं। इस भाव से अफीम लेकर किसानों को ठगा जाता है। अफीम नीति निर्धारण में राजनीति को दूर रखकर किसानों उपस्थिति सुनिश्चित की जाये।

गांवों में पट्टाधारी किसान का अलग ही सम्मान

अंग्रेजों के शासनकाल में मंदसौर क्षेत्र और इससे सटे राजस्थान के चित्तौड़, कोटा, प्रतापगढ़ व झालावाड़ में अफीम की खेती शुरू की गई थी। समशीतोष्ण जलवायु अनुकूल होने से सर्वाधिक 20 हजार से अधिक पट्टे मंदसौर जिले में हैं।

गांवों में अफीम पट्टाधारी किसान को अलग सम्मान मिलता है इसलिए वह कड़ाके की सर्दी में रात में खेतों में रखवाली करते हैं। डोडे में चीरा लगाने से पहले मां कालिका की पूजा करते हैं। जेब से रुपये लगाकर अफीम की खेती करते हैं। बाजार में अफीम के सह उत्पाद पोस्ता दाना के भाव 2000 रुपये किलो तक हो गए हैं पर सरकार ने दाम नहीं बढ़ाए।

किसान परेशान दुखी

यह केंद्र सरकार की फसल है। पर 2009 के बाद अभी तक दाम नहीं बढ़े हैं। जिस प्रकार केंद्रीय कर्मचारियों को प्रतिवर्ष बोनस और महंगाई भता मिलता है उसी प्रकार अफीम काश्तकार को फसल का निश्शुल्क बीमा एवं बोनस का लाभ मिलना चाहिए। जो काश्तकार फसल की अच्छी उपज देता है उसका राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान होना चाहिए। आज भाव सही और नीति स्पष्ट नहीं होने से किसान परेशान और दुखी है। - योगेंद्र जोशी, आकोदड़ा

लागत नहीं निकल रही है

अफीम के खेत में 15-20 दिन की लुणी चिरनी का खर्च ही 50 हजार रुपये तक होता है। खाद-बीज, हंकाई, जुताई, निदाई-गुदाई वह सभी अलग हैं। विभाग किसानों से 870 रुपये किलो की न्यूनतम दर पर खरीदता है। इससे तो लागत भी नहीं निकल रही है। - कांतिलाल पाटीदार, आकोदड़ा

टेरिफ कमीशन की मांग

अफीम किसानों की समस्याओं को दूर करने के लिए काफी कुछ कार्य किया है। कई लोगों के कटे हुए पट्टे बहाल भी कराएं हैं। अफीम के दाम बढ़ाने के लिए वित्त मंत्रालय के टेरिफ कमीशन तक मांग की जा चुकी है। जल्द ही इसके भी अच्छे परिणाम मिलेंगे। - सुधीर गुप्ता, सांसद

10 हजार रुपये किलो मिले

ग्राम दौरवाड़ा के खूबचंद शर्मा ने बताया कि अफीम फसल में लागत अधिक है। कुल मिलाकर 10 आरी में अब 80 से 90 हजार रुपये तक खर्च आता है। लागत के आधे भाव भी नहीं मिलने से किसान परेशान और दुखी है। अफीम के भाव न्यूनतम 10 हजार रुपये प्रति किलो से प्रारंभ किए जाए ताकि किसानों को उसकी लागत मूल्य का भाव मिल सके।

10 आरी अफीम की बोवनी पर होता है इतना खर्च

  • खाद-बीज,खेत हंकाई जुताई - 30000 रुपये
  • पौधों में दवा छिड़काव, प्रोटीन - 60000-70000 रुपये
  • लुनाई-चिराई की मजदूरी - 50000 रुपये
  • पानी के टैंकर - 9000 रुपये
  • कुल खर्च - 159000 रुपये
  • (स्रोतः आकड़े किसानों से चर्चानुसार, बीज-3 किलो, 2000 रुपये प्रतिकिलो)

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