
आलोक शर्मा, नईदुनिया, मंदसौर। मंदसौर में 500 से अधिक मुस्लिम रात-दिन हिंदुओं के लिए कलावा बनाने में जुटे हैं। कलावा बनाना इनका रोजगार है और इसी से इनका परिवार पलता है। मंदसौर के मुस्लिम घरों में बना यह कलावा देश-विदेश के सैकड़ों मंदिरों में जाएगा और वहां हिंदुओं की कलाई पर बंधकर उनकी आस्था का प्रतीक बनेगा।
दरअसल, इन दिनों हिंदुओं का पवित्र माह सावन चल रहा है, इसलिए देशभर के मंदिरों में कलावा (रक्षासूत्र) बिकना और बंधना बढ़ गया है। इसके कारण मंदसौर के इन मुस्लिम परिवारों की व्यस्तता भी बढ़ गई है। मंदसौर में बना कलावा (रक्षासूत्र) अन्य स्थानों पर बने कलावा से अधिक लच्छेदार, चटख रंगों वाला और मजबूत होता है।
इस कारण यह दक्षिण भारत के तिरुपति बालाजी मंदिर से लेकर उज्जैन के महाकाल मंदिर तक पहुंचता है। इसके साथ ही यह देश के कई तीर्थस्थलों के साथ-साथ विदेश तक भी जाता है। इसे बनाने का काम करने वाले मुस्लिम परिवारों के लिए बीते करीब 200 वर्षों से यही रोजी-रोटी का जरिया है।
नई पीढ़ियां आती गईं और पुरानी पीढ़ी से कच्चे सूत को रंग-बिरंगा बनाकर उससे कलावा तैयार करने का हुनर सीखती गईं। यहां बना कलावा इंदौर, उज्जैन व अजमेर की मंडियों के माध्यम से देश-विदेश में भेजा जा रहा है। श्रावण, दीपावली सहित अन्य बड़े हिंदू त्योहारों के दौरान इसकी मांग बढ़ जाती है।
मंदसौर में लच्छा बनाने का काम 100 परिवारों के लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी कर रहे हैं। कच्चे सूत को हुनर भरे हाथों से इन लोगों ने लच्छे और रक्षा सूत्र के रूप में देश भर में पहचान दिलाई है। सफेद सूत से बना कलावा आम धागा नहीं है, बल्कि इसे रक्षा सूत्र कहते हैं। मंदिर से लेकर दरगाह, सुख से लेकर दुख हर जगह उपयोग में आने वाला यह कलावा मंदसौर की भी पहचान बन गया है।
खानपुरा क्षेत्र में नीलगर मोहल्ले में हर घर में लच्छा बनाने का काम किया जाता है। इनके पूर्वज 200 सालों से यही काम कर रहे हैं। लकड़ी के हथौड़े से कच्चे धागे को पीटकर कलावा तैयार किया जाता है, फिर उसे विभिन्न रंगों में डुबाया जाता है।
यहां रहने वाले 200 से ज्यादा मुस्लिम परिवार के छोटे-बड़े सभी सदस्य सुबह से शाम तक एक ही काम में लगे हुए हैं। अभी श्रावण में मांग ज्यादा होने से आर्डर पूरे करने के लिए काम कर रहे हैं। सबसे ज्यादा कलावा गुजरात, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और पंजाब में भेजा जाता है।
सूत के सफेद धागे को रात भर पानी में गला कर अल सुबह लोहे के ड्रम में रंग मिलाकर उबालते हैं। लाल रंग के पानी में उबालकर हरा, नीला रंग मिलाकर कलावा बनाया जाता है। महंगाई में लोगों को दिक्कतें हो रही हैं। मुनाफा भी दिनोंदिन कम होता जा रहा है। - मुजफ्फर, कलावा बनाने वाले कारीगर
आंध्र प्रदेश के तिरुपति बालाजी, महाराष्ट्र के शिरडी के साईं बाबा, उज्जैन के महाकाल मंदिर से लेकर राजस्थान की अजमेर शरीफ की दरगाह सहित देश के अनेक धार्मिक व पवित्र स्थानों पर उपयोग आने वाला यह पवित्र धागा कौमी एकता की पहचान है और यही लच्छा मंदसौर को भी एक अलग पहचान दे रहा है। - सादिक गौरी, कलावा बनाने वाले कारीगर