
नईदुनिया प्रतिनिधि, महू। महू कैंटोनमेंट बोर्ड क्षेत्र में पीलिया और टाइफाइड का प्रकोप थमता नजर नहीं आ रहा है। क्षेत्र में दो और नए मरीज सामने आने के बाद अब कुल मरीजों की संख्या 31 हो गई है। वर्तमान में पांच बच्चे अस्पताल में भर्ती हैं, जिनमें से कुछ की स्थिति गंभीर बनी हुई है। ताजा स्वास्थ्य जांचों ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि बच्चों के ब्लड सैंपल में हेपेटाइटिस ए और हेपेटाइटिस ई वायरस की पुष्टि हुई है।
चिकित्सकों के अनुसार, हेपेटाइटिस ए और ई पूरी तरह से जलजनित वायरस हैं। मेवाड़ा अस्पताल के डॉ. विमल कुमार सक्सेना ने बताया कि ये वायरस तब सक्रिय होते हैं जब पेयजल में मलमूत्र (सीवेज) का मिश्रण होता है। यह सीधा लिवर पर हमला करता है, जिससे लिवर में गंभीर इन्फेक्शन और सूजन आ जाती है। चंदर मार्ग निवासी 12 वर्षीय मोहम्मद उमर शलमानी इसका ताजा उदाहरण है, जो पिछले 15 दिनों से बिस्तर पर है और बीमारी के कारण उसकी स्कूल परीक्षाएं भी छूट गई हैं।
एक ओर जहां मरीजों के खून के नमूने चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि बीमारी पानी से फैली है, वहीं लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) की रिपोर्ट इसके विपरीत है। एसडीएम राकेश परमार ने बताया कि पत्ती बाजार और सुर्की गली से लिए गए नर्मदा जल और बोरवेल के 16 नमूनों की रिपोर्ट सामान्य आई है। अब स्थिति को स्पष्ट करने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने मरीजों के घरों से पानी के नमूने लेकर पुणे स्थित लैब भेजे हैं, जहां सूक्ष्मजीवों और वायरोलॉजी की विस्तृत जांच की जाएगी।
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महू में इस बीमारी के फैलने का मुख्य कारण बुनियादी ढांचे का जर्जर होना माना जा रहा है। क्षेत्र में अंग्रेजों के जमाने का ड्रेनेज सिस्टम और 70 साल पुरानी पाइपलाइनें हैं। गंभीर बात यह है कि कई पेयजल पाइपलाइनें नालियों के बीच से गुजर रही हैं। चंदर मार्ग और सुरकी गली जैसे इलाकों में लोगों ने ड्रेनेज की नालियों पर कब्जा कर घर बना लिए हैं, जिससे पिछले 10 साल से इन नालियों की सफाई नहीं हो सकी है।
चोक हो चुकी नालियों और जमी हुई गाद को निकालने के लिए कैंटोनमेंट बोर्ड अब घरों के भीतर जाकर खुदाई करने को मजबूर है। शनिवार को एक घर के किचन में खुदाई कर ड्रेनेज लाइन निकाली गई, लेकिन अतिक्रमण इतना गहरा है कि सफाई के औजार वहां तक नहीं पहुंच सके। प्रशासन अब इस पुरानी और चोक हो चुकी व्यवस्था को सुधारने के लिए वैकल्पिक रास्तों की तलाश कर रहा है।