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चंबल में आधुनिक तकनीक का कमाल: अल्ट्रासोनिक तरंगों से हो रही गंगा डॉल्फिन की गिनती, 7 दिन में 110 से अधिक की पहचान

चंबल नदी में गंगा डॉल्फिन की आबादी का आकलन करने के लिए दूसरी बार डॉल्फिन सेंसस कराया जा रहा है। इससे पहले वर्ष 2022 में हुए पहले सेंसस में चंबल में 25...और पढ़ें

By Hariom GaurEdited By: Rajdil Shivhare
Publish Date: Mon, 12 Oct 2026 04:52:50 PM (IST)Updated Date: Mon, 12 Oct 2026 04:53:35 PM (IST)
चंबल में आधुनिक तकनीक का कमाल: अल्ट्रासोनिक तरंगों से हो रही गंगा डॉल्फिन की गिनती, 7 दिन में 110 से अधिक की पहचान
चंबल नदी में डब्ल्यूआईआई देहरादून का दल तरंगों के माध्यम से डाल्फिन की गणना करते हुए। नईदुनिया

HighLights

  1. हाईटेक उपकरणों का उपयोग
  2. सटीक आंकड़ों की उम्मीद
  3. कमजोर नजर का वैज्ञानिक आधार

हरिओम गौड़, नईदुनिया, मुरैना। चंबल नदी की गहराइयों में छिपी गंगा डॉल्फिन की गिनती अब आधुनिक तकनीक से की जा रही है। पानी की सतह पर महज दो-तीन सेकंड के लिए दिखाई देने वाली डॉल्फिन को पहचानने के लिए भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआइआइ), देहरादून की टीम अल्ट्रासोनिक तरंगों और हाईटेक उपकरणों की मदद ले रही है।

सात दिनों के सर्वे में 110 से अधिक डॉल्फिन की पहचान होने की जानकारी सामने आई है। हालांकि, इनकी वास्तविक संख्या का पता 15 अक्टूबर को सर्वे पूरा होने के बाद ही चलेगा।

वर्ष 2022 में हुए पहले सेंसस में 250 डॉल्फिन दर्ज

चंबल नदी में गंगा डॉल्फिन की आबादी का आकलन करने के लिए दूसरी बार डॉल्फिन सेंसस कराया जा रहा है। इससे पहले वर्ष 2022 में हुए पहले सेंसस में चंबल में 250 डॉल्फिन दर्ज की गई थीं। इस बार 7 अक्टूबर से शुरू हुआ सर्वे मुरैना-धौलपुर क्षेत्र के डांग बसई घाट से शुरू होकर उत्तर प्रदेश की सीमा में पचनदा घाट तक चलेगा। चंबल नदी के इस हिस्से की लंबाई करीब 250 किलोमीटर है। इसी क्षेत्र में डॉल्फिन की मौजूदगी दर्ज की जाती है।


22 सदस्यीय टीम कर रही है सर्वे

डब्ल्यूआईआई के डॉल्फिन विशेषज्ञ डॉ. अमित कुमार के नेतृत्व में 22 सदस्यीय टीम सर्वे कर रही है। टीम के साथ चंबल घड़ियाल अभयारण्य के दो दर्जन से अधिक कर्मचारी भी लगाए गए हैं। इन्हें सर्वे से पहले एक दिन का प्रशिक्षण दिया गया। प्रतिदिन औसतन 18 से 20 किलोमीटर नदी क्षेत्र का सर्वे किया जा रहा है। सात दिनों में करीब 130 किलोमीटर क्षेत्र का सर्वे पूरा किया जा चुका है।

हर साल की गणना और सेंसस के आंकड़ों में अंतर

चंबल में डॉल्फिन की संख्या को लेकर अलग-अलग गणनाओं में बड़ा अंतर सामने आया है। वर्ष 2022 में हुए पहले डॉल्फिन सेंसस में इनकी संख्या 250 बताई गई थी। वहीं, चंबल घड़ियाल अभयारण्य और डब्ल्यूआईआई की ओर से हर साल फरवरी में की जाने वाली जलीयजीव गणना में इससे काफी कम डॉल्फिन दर्ज हुईं। इस वर्ष फरवरी में हुई गणना में चंबल में 155 डॉल्फिन दर्ज की गई थीं। वर्ष 2025 की गणना में इनकी संख्या करीब 116 बताई गई थी। इससे पहले के वर्षों में भी आंकड़े 100 से कम रहे थे।

वास्तविक आबादी का सटीक आकलन होने की उम्मीद

ऐसे में इस बार आधुनिक तकनीक से हो रहे सर्वे से डॉल्फिन की वास्तविक आबादी का अधिक सटीक आकलन होने की उम्मीद है। चंबल घड़ियाल अभयारण्य के डीएफओ एचसी बघेल के अनुसार, वार्षिक जलीयजीव गणना में मुख्य रूप से उन जीवों को दर्ज किया जाता है, जो सर्वे के दौरान दिखाई देते हैं। पानी के भीतर मौजूद डॉल्फिन की गिनती उस प्रक्रिया में नहीं हो पाती। यही वजह है कि दोनों गणनाओं के आंकड़ों में अंतर दिखाई देता है।

पानी के भीतर की गतिविधियां पकड़ेंगे आधुनिक उपकरण

गंगा डॉल्फिन हर दो से तीन मिनट में सांस लेने के लिए पानी की सतह पर आती है और महज दो-तीन सेकंड में वापस गहराई में चली जाती है। इतने कम समय में उसकी पहचान और गिनती करना आसान नहीं है। इसी चुनौती से निपटने के लिए डब्ल्यूआईआई की टीम अल्ट्रासोनिक तरंगों पर आधारित तकनीक का इस्तेमाल कर रही है। सर्वे टीम के पास एप-पोट और ए-टेग जैसे आधुनिक उपकरण हैं। इनकी मदद से पानी के भीतर मौजूद डॉल्फिन की गतिविधियों का पता लगाया जाता है।

गंगा डॉल्फिन की देखने की क्षमता होती है कमजोर होती

उपकरणों की सीमा में डॉल्फिन आने पर उसकी गतिविधि कंप्यूटर स्क्रीन पर दिखाई देती है। इसके बाद सर्वेयर उसकी पहचान की पुष्टि कर गणना में उसे दर्ज करते हैं। गंगा डॉल्फिन की देखने की क्षमता बेहद कमजोर होती है। वह पानी में दिशा पहचानने, आसपास की वस्तुओं का पता लगाने और खतरे को भांपने के लिए ध्वनि तरंगों का सहारा लेती है। यही प्राकृतिक विशेषता उसकी मौजूदगी का पता लगाने में इस्तेमाल की जा रही तकनीक का आधार है।

चंबल में गंगा डॉल्फिन की गणना के लिए डब्ल्यूआईआई की ओर से दूसरा डॉल्फिन सेंसस कराया जा रहा है। इसमें आधुनिक तकनीक से सर्वे किया जा रहा है। हमारी वार्षिक जलीयजीव गणना में आंखों से दिखाई देने वाले जीवों को दर्ज किया जाता है, इसलिए पानी के भीतर मौजूद डॉल्फिन की गिनती नहीं हो पाती। इस सर्वे से उनकी संख्या की अधिक सटीक जानकारी सामने आने की उम्मीद है। सर्वे 15 अक्टूबर को पूरा होगा। - एचसी बघेल, डीएफओ, चंबल घड़ियाल अभयारण्य, मुरैना