
नईदुनिया प्रतिनिधि, नरसिंहपुर। नरसिंहपुर के शासकीय जिला अस्पताल परिसर से मानवता को शर्मसार और व्यवस्था के दावों को बेनकाब करने वाली एक बेहद हृदयविदारक घटना सामने आई है।
108 एंबुलेंस सेवा की लापरवाही ने एक हंसते-खेलते परिवार की उम्मीदें हमेशा के लिए छीन लीं। ग्राम सूरवारी की रहने वाली 65 वर्षीय वृद्धा शम्मो बी को हृदयाघात के बाद जिला अस्पताल के आईसीयू में दाखिल कराया गया था।
जब चिकित्सकों ने उनकी गंभीर हालत को देखते हुए जबलपुर रेफर किया, तब परिजनों को जरा भी अंदाजा नहीं था कि उन्हें अपनी ही व्यवस्था से इस कदर लड़ना पड़ेगा। अस्पताल परिसर में खड़ी एंबुलेंस (सीजी 04 एनएस 4594) तक मरीज को पहुंचाने के लिए परिजनों को पहले व्हीलचेयर का सहारा लेना पड़ा। दर्द और बेबसी का यह सफर यहीं खत्म नहीं हुआ।
आरोप है कि जब मरीज को एंबुलेंस के भीतर लिटा दिया गया, तब ऐन वक्त पर एंबुलेंस कर्मी ने यह कहकर हाथ खड़े कर दिए कि सिलेंडर में ऑक्सीजन कम है और दूसरा सिलेंडर मंगवाना पड़ेगा। जिंदगी और मौत के बीच झूलती बुजुर्ग महिला के परिजन करीब आधे घंटे तक अस्पताल परिसर में खड़े होकर असमंजस और खौफ के साए में इंतजार करते रहे।
जब सिस्टम की सुस्ती ने परिजनों के सब्र का बांध तोड़ दिया, तो उनका आक्रोश फूट पड़ा। हर बीतता पल मरीज की सांसों को कम कर रहा था, लिहाजा बेबस पुत्र हसन अपनी तड़पती बुजुर्ग मां को एंबुलेंस से उतारकर करीब 150 मीटर तक अपने कंधों पर उठाकर अस्पताल के मुख्य गेट की तरफ भागे। यह मंजर जिसने भी देखा, उसका दिल दहल गया और सरकारी दावों के प्रति गुस्सा उबल पड़ा।
मुख्य गेट से परिजन जैसे-तैसे उन्हें एक ऑटो में लिटाकर सुभाष पार्क स्थित एक निजी अस्पताल ले गए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इलाज के दौरान वृद्धा ने दम तोड़ दिया। बिलखते परिजनों का बस एक ही रुदन है कि अगर वक्त पर ऑक्सीजन और एंबुलेंस मिल जाती, तो शायद उनकी मां आज जिंदा होतीं।
'यह बहुत ही दुखद और शर्मनाक घटना है। इसके पूर्व भी मैंने इन्हें नोटिस दिया था। 108 एंबुलेंस वालों पर कार्रवाई का हमें अधिकार नहीं है, लेकिन शासन को इसके संबंध में पत्र लिख रहा हूँ और कठोर कार्रवाई के प्रयास करूँगा।' - डॉ. मनीष मिश्रा, सीएमएचओ नरसिंहपुर