• Jagran.com
  • Jagran Josh
  • Her Zindagi
  • Onlymyhealth
  • Jagran TV
  • Vishvas News
  • Inextlive
  • मेरी खबरें
मेरी खबरें
  • होम
  • ताजा खबरें
  • मध्यप्रदेश
  • छत्तीसगढ़
  • उत्तर प्रदेश
  • देश
  • धर्म
  • मनोरंजन
  • राशिफल
  • लाइफस्टाइल
  • अन्य
    • बिज़नेस
    • बड़ी खबरें
    • खेल
    • विदेश
    • करियर
    • टॉपिक्स
    • टेक्नोलॉजी
    • शिक्षा
  • राज्य चुनें
  • ई-पेपर
  • राशिफल
  • राज्य चुनें
  • ई-पेपर
  • फटाफट
  • राशिफल
  • वेब स्टोरीज
नईदुनिया ट्रेंडिंग
  • बढ़ता यूपी
  • AI बूटकैंप
  • समृद्ध उत्तराखंड
  • गणेशोत्‍सव 2026
  • हनुमान अंश
  • Mutual Funds मास्टरी
  • मध्‍य प्रदेश की खबरें
  • राशि परिवर्तन
  • मानसून
  • स्वच्छ जल
  • होम
  • मध्य प्रदेश
  • नरसिंहपुर

160 साल पुरानी अनूठी परंपरा, मुड़िया गांव में रावण नहीं, 'कंस वध' से होती है बुराई पर अच्छाई की जीत

नरसिंहपुर जिले के मुड़िया में शनिवार को 160 से भी अधिक वर्षों पुरानी अनूठी और ऐतिहासिक परंपरा का निर्वहन किया गया। यहां दशहरे पर रावण दहन की तर्ज पर ब...और पढ़ें

By VARIJ BAJPAIEdited By: Mohan Kumar
Publish Date: Sun, 27 Sep 2026 01:10:47 PM (IST)Updated Date: Sun, 27 Sep 2026 01:10:47 PM (IST)
160 साल पुरानी अनूठी परंपरा, मुड़िया गांव में रावण नहीं, 'कंस वध' से होती है बुराई पर अच्छाई की जीत
मुड़िया में फिर मारा गया कंस, आज भी जीवंत है 160 साल पुरानी परंपरा

HighLights

  1. मुड़िया में फिर मारा गया कंस
  2. आज भी जीवंत है 160 साल पुरानी परंपरा
  3. महामारी से मुक्ति के लिए शुरू हुई थी प्रथा

नईदुनिया प्रतिनिधि, नरसिंहपुर। जिला मुख्यालय के समीपी ग्राम मुड़िया में शनिवार को 160 से भी अधिक वर्षों पुरानी अनूठी और ऐतिहासिक परंपरा का अपार जनउत्साह के साथ निर्वहन किया गया। दशहरे पर रावण दहन की तर्ज पर मुड़िया में बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक रूप में 'कंस वध' का भव्य आयोजन किया जाता है। यह आयोजन बीते दिवस भी देखने को मिला, जिसमें भगवान कृष्ण और कंस के दल जब आमने-सामने आए, तो पूरा क्षेत्र जयकारों से गूंज उठा।

महामारी से मुक्ति के लिए शुरू हुई थी प्रथा

आयोजन से जुड़े डा. विवेक सक्सेना और मनीष पटेल ने बताया कि लगभग 160 वर्ष पूर्व गांव में भीषण महामारी फैली थी, जिससे व्यापक जनहानि हुई थी। उस समय महामारी के संकट से मुक्ति पाने के लिए ग्रामवासियों ने इस परंपरा की शुरुआत की थी। लोक मान्यता है कि जब से इस परंपरा का निर्वहन शुरू हुआ है, तब से गांव में कभी कोई महामारी या आपदा नहीं आई।


बच्चों और बड़ों ने रची कृष्ण व कंस की सेनाएं

परंपरा के अनुसार ग्रामीणों ने अपने खेतों व घरों की पवित्र मिट्टी एकत्र कर गांव के बाहर कंस की विशाल प्रतिमा निर्मित की, जिसके मुकुट पर कांस की कलगी (विशेष सफेद फूल) सुसज्जित की गई। इसके बाद गांव के ही लोग दो दलों में बंट गए।

यह भी पढ़ें- भारत का अनोखा गांव... जहां हनुमान जी नहीं, बल्कि पूजे जाते हैं 'दैत्य', मारुति गाड़ी खरीदने पर भी है सख्त पाबंदी

एक ओर भगवान कृष्ण का दल तो दूसरी ओर कंस का दल, जिसमें राक्षस रूप में बच्चे और बड़े शामिल हुए। सांकेतिक युद्ध शुरू हुआ, जो करीब 2 से 3 घंटे चला। इस रोमांचक युद्ध के अंत में भगवान कृष्ण के स्वरूप ने कंस के मुकुट से कांस की कलगी उखाड़कर उसका सांकेतिक वध किया। कंस वध होते ही कृष्ण के दल की विजय हुई और पूरे गांव ने ढोल-नगाड़ों के साथ जश्न मनाना शुरू कर दिया।