नीमच (नईदुनिया प्रतिनिधि)।
श्री अग्रसेन सोशल ग्रुप के तत्वावधान में शहर के पारसमणि गार्डन में हो रही श्रीमद् भागवत ज्ञान गंगा में श्री कृष्ण जन्मोत्सव मनाया गया। कथा में जैसे ही श्रीकृष्ण जन्म प्रसंग आया पूरा पांडाल हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैयालाल के जयकारों से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने बाल स्वरूप श्री कृष्ण के दर्शन किए और व्यास पीठ पर विराजित भागवताचार्य पं. भीमाशंकर शास्त्री ने नन्हें कान्हा को दुलारा। कथा में पं. शास्त्री ने श्रीकृष्ण जन्म के प्रसंग सुनाते हुए कृष्ण की बाल लीला का वर्णन किया। इस दौरान बाल कृष्ण को कंस के कारागार से नंद बाबा के घर ले जाने की झांकी भी प्रस्तुत की गई। कथा में पं. शास्त्री ने कहा कि ययाति के बड़े पुत्र यदु हुए। उन्हीं के वंश में भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्णपक्ष अष्टमी को रात्रि 12 बजे रोहिणी नक्षत्र में हुआ। भगवान कृष्ण ने संसार को अंधेरे से प्रकाश में लाने के लिए जन्म लिया और अज्ञान रूपी अंधकार को ज्ञानरूपी प्रकाश से दूर किया। भगवान कृष्ण को जब वासुदेव यशोदा मैया के घर लेकर जा रहे थे तो शेषनाग ने छाया की और मां यमुना ने चरण छुए। वासुदेव कृष्ण को नंदबाबा के घर छोड़कर यशोदा मैया की कन्या को लेकर वापस कंस के कारागृह में आए। कथा व्यास ने पूतना के उद्धार का प्रसंग सुनाया। कथा में पं. शास्त्री ने दानवीर कर्ण का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि दान ऐसा होना चाहिए। जो एक हाथ से दें तो दूसरे हाथ को पता न चले। उन्होंने कहा कि दान दो, पर उसका बखान मत करों। उन्होंने कहा कि जो अच्छे कर्म करते हैं। वे कभी मन में फल की इच्छा नहीं रखते है। क्योंकि फल देने वाले की नजरे तो सदैव आप पर बनी हुई है। उन्होंने कहा कि संकल्प में विकल्प मत खोजिए। लक्ष्य प्राप्त करने के लिए संकल्प लें और अपना कर्म करते रहें। जीवन में भटकाने के लिए विकल्प बहुत मिलेंगे। लेकिन संकल्प लेकर चलें तो सफलता जरूर मिलेगी। उन्होंने अजामिल के प्रसंग पर कहा कि संसार में ब्राह्मणों को ब्राह्मणदेव कहा गया है। ब्राह्मण अगर आपके घर में आगर भोजन करते हैं तो उनके आशीर्वाद से घर के दोष दूर हो जाते हैं। ब्राह्मण के कहने पर अजामिल ने अपने 10वें पुत्र का नाम नारायण रखा था और नारायण को पुकारते-पुकारते उसे सद्गति मिल गई। कथा में उन्होंने राधा-कृष्ण के प्रेम का वर्णन करते हुए कहा कि श्याम से मिलना है तो राधाजी को याद करों। श्याम प्रभु तो दौड़े चले आएंगे। उन्होंने कहा कि राधा-कृष्ण के मिलन का निमित मोर था। जिसके कारण प्रभु मोरपंख धारण करते हैं। पं. शास्त्री ने कहा कि राधा और कृष्ण अगल-अलग नहीं है। लेकिन जो राधाकृष्ण को अलग-अलग माने वह नरकीय जीव है। राधा और कृष्ण तो एक ही नाम है। उन्होंने कहा कि जो प्रभु की चरण-शरण हो जाता है। प्रभु उसे तार देते हैं और जो विपरित चलते हैं। कथा में पं. शास्त्री ने कर्ण, अजामिल, मोर, परिक्षित, वामन, समुद्र मंथन, कृष्ण जन्म आदि प्रसंगों की वर्तमान परिपेक्ष्य में व्याख्या की।
श्री कृष्ण जन्म के प्रसंग पर भावविहल हुए श्रद्धालु
कथा में श्रीकृष्ण जन्म के प्रसंग पर कथा पांडाल में उपस्थित श्रद्धालु भावविहल हो गए और हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैयालाल की, नंद के घर आनंद भयो आदि जयकारों से कथा पांडाल गूंजायमान हो गया। कथा में श्रीकृष्ण को जन्म के बाद करागार से गोल ले जाते हुए संजीव झांकी चित्रण भी किया। इस मौके पर श्रीकृष्ण स्वरूप पांच माह के बालक केदार्थ माता-पिता निकिता विपुल गर्ग दड़ौली वाले को बनाया गया। जिसे टोकरी में उठाकर वासदेव का रूप धरे गोपाल गर्ग गोकुल लेकर पहुंचे। गोकुल पहुंचते ही व्यासपीठ पर पं. शास्त्री ने बालकृष्ण का दुलार किया। ब़ड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने कथा का आनंद उठाया।