*क्षमापना के साथ श्वेतांबर जैन समाज के पर्युषण पर्व का समापन, नीमच में हुए कई आयोजन
नीमच (नईदुनिया प्रतिनिधि)। जैन महापर्व पर्युषण का समापन शुक्रवार को क्षमापना के साथ किया गया। जैन समाज के धर्मावलंबियों ने मन, वचन व काया से जाने अनजाने में जीव मात्र को पहुंची त्रुटि के लिए 'मिच्छामि दुक्कड़म' कहकर क्षमायाचना की। कल्पसूत्र ग्रंथ के वाचन का समापन शुक्रवार दोपहर में सुश्रावकों ने किया। इसमें ज्ञान की पूजा एवं मंदिर में होने वाली अष्टप्रकारी पूजा के चढ़ावे बोले गए। पर्युषण पर्व के आठवें दिन समाजजन में उत्साह रहा। कई धार्मिक आयोजनों का दौर जारी है। व्याख्यान में भगवान पार्श्वनाथ एवं नेमीनाथजी के चरित्र एवं बरसा सूत्र के वर्णन का वाचन किया गया।
साध्वी हितदर्शना श्रीजी मसा ने भगवान पार्श्वनाथजी के जन्म का उल्लेख करते हुए बताया कि भगवान के पांचों कल्याण जन्म, दीक्षा, कैवल्य ज्ञान और मोक्ष भी विशाल नक्षत्र में हुए थे। साथ ही भगवान के दस भावों का वर्णन भी किया गया। सुश्रावकों ने बताया कि भगवान नेमीनाथजी के पांचों कल्याण चित्रा नक्षत्र में हुए। भगवान नेमीनाथ के चरित्र का वर्णन करते हुए बताया कि भगवान जब शादी के तोरण पर आए तो उन्होंने देखा कि अनेक जानवर पिंजरे में बंद हैं। उन्होंने अपने सारथी से पूछा कि ये सब पिंजरे में बंद क्यों हैं? सारथी ने कहा कि यह सभी विवाह भोज के लिए हैं। इस पर भगवान ने कहा कि मुझे ऐसा विवाह नहीं करना है जो नरक का मार्ग प्रशस्त करता हो।
भगवान वहीं से गिरनार पर्वत पहुंचे तथा वहां दीक्षा लेकर केवल ज्ञान की प्राप्ति कर मोक्ष को प्राप्त हुए। बुरे पाप कर्म करने से हमें बचना चाहिए। माता की सेवा पहले करें, फिर धर्म पुण्य कर्म करें। प्रभु की समाचारी आज्ञा का पालन करना चाहिए। ब्रह्मचर्य व्रत का पालन मोक्ष मार्ग दिलाने में सहायक होता है। बच्चों की धार्मिक पाठशाला निरंतर चलना चाहिए। धर्म संस्कार बच्चों को सिखाएंगे तभी धर्मयुक्त समाज का निर्माण होगा। भगवान के धार्मिक दीक्षा, जन्म, निर्वाण, उपसर्ग, देषना, केवल ज्ञान आदि के चित्रों का दर्शन कराया गया।
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'गलती को क्षमा करना विश्व का सबसे महान कर्म'
नीमच। किसी भी व्यक्ति की बड़ी से बड़ी गलती को क्षमा करना विश्व का सबसे महान कर्म है। क्षमा करने वाला महान होता है। क्षमा करने से पुण्य प्रबल होता है। क्षमा करने से दुश्मनी समाप्त हो दोस्ती में बदल जाती है।
यह बात साध्वी गुणरंजना श्रीजी मसा ने कही। वे श्री शंखेश्वर पार्श्व पदमावती धाम ट्रस्ट श्रीसंघ एवं चातुर्मास समिति द्वारा पद्मावती धाम शक्तिनगर में आयोजित पर्युषण पर्व के अंतिम दिन धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि अतिथि के निमित्त भोजन बनाया और साधु-संतों को बोहराया तो महान पुण्य फल मिलता है। इस अवसर पर श्वेतांबर समाज के पर्युषण पर्व के अंतिम दिवस क्षमायाचना दिवस साधक साधिकाओं ने एक-दूसरे को 'मिच्छामि दुक्कड़म' कहा और अपने से जाने अनजाने में हुई भूल के लिए प्रेषित कर क्षमा मांगी।
संवत्सरी पर्युषण महापर्व विभिन्ना साधना आराधना एवं तपस्याओं के साथ सम्पन्ना हुआ। साध्वी मसा ने कहा कि क्षमापना पर्व पर जीवन में तीन गुणों को विकसित करना आवश्यक है। व्यवहार में कोमलता, ह्दय में निर्मलता और मन में मेरा निरंकार भाव लाना चाहिए। जब ध्यान में होते हैं भगवान महावीर के दिए दिव्य ज्ञान में पूरे विश्व का दर्शन समाहित है। महासंवत्सरी पर्व सम्मान जीव दया और पवित्र दिन है। जाने-अनजाने में जो भूल या गलतियां हुई हैं, उन पर आत्मचिंतन करने का दिन है। धर्मसभा में धर्मशास्त्र से संबंधित चित्रों के दिव्य दर्शन भी कराए गए। सुख के साथ दोस्ती का कार्य दुश्मनी कार्य ही होता है। दुख हमें सीधा रखता है। दुख हमें संस्कारित करता है। शुद्ध बनाता है। साधक बनाता है। सिद्धि दिलाता है। सभी सुख अच्छे नहीं होते हैं तो सभी दुख भी खराब नहीं होते हैं।