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पन्ना के प्राणनाथ जी मंदिर में 350 साल से गूंज रहा घंटा, कभी शहर को बताता था समय; 1864 में लंदन से आया था

पन्ना के श्री प्राणनाथ जी मंदिर में 350 वर्षों से घंटा बजाने की परंपरा जारी है। वर्ष 1864 में लंदन से आए इस विशाल घंटे से लोगों को समय और प्रहर का बोध...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: Anurag Mishra
Publish Date: Wed, 21 Oct 2026 11:33:06 AM (IST)Updated Date: Wed, 21 Oct 2026 11:33:06 AM (IST)
पन्ना के प्राणनाथ जी मंदिर में 350 साल से गूंज रहा घंटा, कभी शहर को बताता था समय; 1864 में लंदन से आया था
पन्ना के प्राणनाथ जी मंदिर में 350 साल से गूंज रहा घंटा। (नईदुनिया)

HighLights

  1. प्राणनाथ जी मंदिर में 350 साल पुरानी घंटा बजाने की परंपरा।
  2. वर्ष 1864 में लंदन से लाया गया था विशाल अष्टधातु घंटा।
  3. पुराने समय में घंटे की गूंज से मिलता था प्रहर का संकेत।

नईदुनिया प्रतिनिधि, पन्ना। बुंदेलखंड की ऐतिहासिक धरा पन्ना केवल अपने भव्य मंदिरों और धार्मिक आस्था के लिए ही नहीं, बल्कि सदियों पुरानी अनूठी परंपराओं के लिए भी विशेष पहचान रखती है। यहां स्थित श्री प्राणनाथ जी मंदिर में घंटा बजाने की परंपरा लगभग साढ़े तीन सौ वर्षों से चली आ रही है।

कभी इस घंटे की गूंज पूरे शहर और आसपास के गांवों तक लोगों को समय का बोध कराती थी, तो आज इसकी ध्वनि श्रद्धा, आध्यात्मिक चेतना और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की याद दिलाती है। आधुनिक समय में घड़ी और मोबाइल ने समय जानने के पुराने साधनों की जगह ले ली है, लेकिन मंदिर में घंटा बजाने की परंपरा आज भी निरंतर जारी है।


प्रणामी संप्रदाय के प्रमुख आस्था केंद्र श्री प्राणनाथ जी मंदिर में देश-विदेश से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। विशेष रूप से शरद पूर्णिमा महोत्सव के दौरान हजारों सुंदरसाथ मंदिर पहुंचकर महामति प्राणनाथ जी के दर्शन करते हैं और आध्यात्मिक वातावरण में स्वयं को धन्य अनुभव करते हैं। मंदिर की परंपराएं इस धाम की ऐतिहासिक और धार्मिक विशिष्टता को और भी बढ़ाती हैं।

घंटे की गूंज से मिलता था समय और प्रहर का बोध

  • पुराने समय में जब आम लोगों के पास घड़ियां और समय मापने के आधुनिक साधन उपलब्ध नहीं थे, तब मंदिर के गुंबद में लगे विशाल घंटे की ध्वनि लोगों के लिए समय जानने का प्रमुख माध्यम थी। घंटे की आवाज पूरे पन्ना शहर में गूंजती थी। रात्रि के सन्नाटे में इसकी ध्वनि आसपास के गांवों तक सुनाई देती थी। लोग घंटे की आवाज के अनुसार अपनी दिनचर्या निर्धारित करते थे। लगभग चार दशक पहले तक इसकी यह उपयोगिता बनी रही।

  • प्रणामी समाज के प्रतिष्ठित साहित्यकार अश्विनी दुबे के अनुसार, मंदिर के घंटे से समय के साथ-साथ प्रहर बदलने का भी संकेत मिलता था। हिंदू परंपरा में दिन-रात को आठ प्रहरों में बांटा गया है और प्रत्येक प्रहर तीन घंटे का माना जाता है। प्रहर परिवर्तन पर मंदिर का घंटा दो बार बजाया जाता था। देश के कई प्राचीन मंदिरों में भी बड़े घंटे बजाने की परंपरा रही है।
  • 1864 में लंदन से पन्ना पहुंचा था विशाल घंटा

    • श्री प्राणनाथ जी मंदिर ट्रस्ट के पूर्व सचिव राकेश कुमार शर्मा बताते हैं कि वर्ष 1864 में अष्टधातु से निर्मित कई विशाल घंटे लंदन से भारत लाए गए थे। इनमें से एक घंटा पन्ना के श्री प्राणनाथ जी मंदिर में स्थापित किया गया था। कई दशकों तक इसकी गूंज लोगों को समय का बोध कराती रही। बाद में इसमें दरार आने से आवाज बदल गई। इसकी मरम्मत के प्रयास किए गए, लेकिन पुरानी ध्वनि वापस नहीं आ सकी। इसके बाद मंदिर ट्रस्ट ने भारत में निर्मित एक नया विशाल घंटा स्थापित कराया, जिससे परंपरा आज भी निभाई जा रही है।
    • मंदिर में प्रवेश के समय बजाई जाने वाली घंटी का भी अपना आध्यात्मिक महत्व है। मान्यता है कि इसकी ध्वनि मन को एकाग्र कर विचारों की चंचलता कम करने में सहायक होती है। इससे पूजा और आराधना के समय शांति तथा आनंद की अनुभूति होती है।
    • आज श्री प्राणनाथ जी मंदिर में गूंजता घंटा केवल समय का संकेत नहीं, बल्कि पन्ना की साढ़े तीन सौ साल पुरानी धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक गौरव और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का जीवंत प्रतीक है।