
नईदुनिया प्रतिनिधि, पन्ना। एक समय बाघों से पूरी तरह खाली हो चुके पन्ना के जंगलों में आज फिर बाघों की गर्जना सुनाई देती है। बाघ पुनर्स्थापना की इस ऐतिहासिक सफलता ने पन्ना टाइगर रिजर्व को देश ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर वन्यजीव संरक्षण के एक सफल मॉडल के रूप में पहचान दिलाई है।
बाघों की संख्या पूरी तरह समाप्त होने के बाद मध्यप्रदेश शासन, वन विभाग और भारतीय वन्यजीव संस्थान के संयुक्त प्रयासों से पन्ना में बाघ पुनर्स्थापना योजना शुरू की गई।
बांधवगढ़, कान्हा और पेंच टाइगर रिजर्व से चुनिंदा बाघ और बाघिनों को पन्ना लाकर बसाया गया। इन्हीं संस्थापक बाघों के सफल प्रजनन और बेहतर प्रबंधन ने पन्ना के जंगलों को दोबारा आबाद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पुनर्स्थापना के बाद बाघों की संख्या लगातार बढ़ी। वर्तमान में पन्ना टाइगर रिजर्व और आसपास के वन क्षेत्रों में 100 से अधिक बाघों के विचरण की जानकारी है। इससे पन्ना में वन्यजीव पर्यटन को भी नई गति मिली है।
बाघों को प्राकृतिक वातावरण में देखने के लिए देश-विदेश से पर्यटक पहुंच रहे हैं और सफारी की मांग बढ़ने से स्थानीय रोजगार व आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिला है।
पन्ना की पुनर्स्थापना यात्रा वन्यजीव विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं के लिए भी महत्वपूर्ण बन गई है। देश-विदेश के विशेषज्ञ यहां बाघ पुनर्स्थापना, प्रबंधन और संरक्षण के अनुभवों का अध्ययन कर चुके हैं।
अब वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरणविदों की मांग है कि इस ऐतिहासिक सफलता में भूमिका निभाने वाले संस्थापक बाघों की स्मृतियों को भी संरक्षित किया जाए। इसके लिए स्मारक, स्मृति द्वार, इंटरप्रिटेशन सेंटर में स्थायी छायाचित्र गैलरी या विशेष प्रदर्शनी विकसित करने का सुझाव दिया जा रहा है। इससे पन्ना की संरक्षण यात्रा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकेगी।