
नईदुनिया न्यूज , आलोट। दीपावली हो या कोई मांगलिक अवसर, आमतौर पर लोग अपने घरों में रंग-रोगन और सजावट कराते हैं, लेकिन आलोट क्षेत्र के कछालिया गांव में वर्षों से चली आ रही परंपरा के चलते घरों पर रंग-रोगन नहीं किया जाता। गांव में नया मकान बने या पुराना हो, किसी भी घर की दीवारों पर रंग नहीं किया जाता। ग्रामीण इस परंपरा को गांव में स्थित काल भैरव (कालेश्वर भगवान) मंदिर से जुड़ी मान्यता बताते हैं।
आलोट-जावरा मार्ग पर देहरी फंटे से करीब दो किलोमीटर अंदर बसे कछालिया गांव में 300 से अधिक कच्चे-पक्के मकान हैं। गांव की आबादी करीब 1200 है। दीपावली नजदीक है, लेकिन गांव के किसी भी घर में रंग-रोगन की तैयारी नहीं है। ग्रामीणों के अनुसार, यह परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है और आज भी इसका पालन किया जा रहा है।
गांव के 80 वर्षीय पुजारी नाथूपुरी गोस्वामी और मोहनपुरी बताते हैं कि जब से वे गांव में रह रहे हैं, उन्होंने किसी भी ग्रामीण को अपने मकान पर रंग-रोगन कराते नहीं देखा। उनके अनुसार, गांव में केवल शासकीय भवनों और मंदिर पर ही रंग-रोगन किया जाता है। मंदिर की पूजा-अर्चना की व्यवस्था में हर साल अलग-अलग पुजारी रहते हैं।
गांव के सरपंच प्रतिनिधि जगदीशपुरी बताते हैं कि घरों पर रंग-रोगन नहीं कराने के अलावा भी यहां कई परंपराओं का पालन किया जाता है। ग्रामीण काले कपड़े, जूते, मोजे और बेल्ट जैसी काले रंग की वस्तुओं का उपयोग नहीं करते। यहां तक कि पानी भी छानकर नहीं पीते हैं। विवाह के दौरान दूल्हा घोड़ी पर बैठकर मंदिर के सामने से नहीं निकलता। शादियों में घरों पर सजावटी डिजाइन भी नहीं बनाई जाती हैं।
रोजगार सहायक शांतिलाल के अनुसार, गांव में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत करीब 50 मकान बनाए गए हैं, लेकिन परंपरा के अनुसार इन मकानों पर भी रंग नहीं किया गया है।
ग्रामीणों के अनुसार, गांव के काल भैरव मंदिर में दर्शन और मन्नत मांगने के लिए इंदौर, उज्जैन, मंदसौर और रतलाम सहित कई स्थानों से श्रद्धालु आते हैं। मान्यता है कि मंदिर में सच्चे मन से मांगी गई मन्नत पूरी होती है। विशेषकर भैरव पूर्णिमा पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।