रतलाम में 20 साल साथी की तरह रहे बैल की तेरहवीं पर पूरे गांव को कराया भोज, परिवार के सदस्य की तरह पाला
परिवार में किसी सदस्य की मौत पर श्रद्धांजलि और तेरहवीं का भोज कराया जाता है, लेकिन रतलाम जिले के ग्राम कमेड़ में एक किसान ने अपने 20 साल पुराने बैल की मौत पर पूरे गांव को भोज कराया।
Publish Date: Sat, 12 Sep 2026 06:55:13 PM (IST)Updated Date: Sat, 12 Sep 2026 06:55:13 PM (IST)
बैल की तेरहवीं मनाते किसान परिवार। (नईदुनिया)HighLights
- पिता दो बैल लाए थे, नाम रखा था मामा-भांजा
- ये परिवार के सदस्य हैं और इसी भावना के साथ दोनों का पालन-पोषण किया गया
- दोनों बैल करीब दो दशक तक खेती के काम में परिवार का साथ देते रहे
नईदुनिया प्रतिनिधि, रतलाम : परिवार में किसी सदस्य की मौत पर श्रद्धांजलि और तेरहवीं का भोज कराया जाता है, लेकिन रतलाम जिले के ग्राम कमेड़ में एक किसान ने अपने 20 साल पुराने बैल की मौत पर पूरे गांव को भोज कराया।
किसान के परिवार के लिए ये दोनों बैल महज पशु नहीं थे, बल्कि दो दशक तक खेती के काम में साथ निभाने वाले परिवार के सदस्य थे। पिता जब दोनों बैल लेकर आए थे तो उनका नाम भी मामा-भांजा रखा था। शनिवार को दोनों बैलों की संयुक्त तेरहवीं कर क्रियाकर्म और भोज रखा गया, जिसमें पूरा गांव शामिल हुआ।
पिता का कहना था कि ये परिवार के सदस्य हैं
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बैल की तेरहवीं पर भोज करते ग्रामीण। (नईदुनिया)
ग्राम कमेड़ निवासी दिनेश पुत्र शंभूलाल पाटीदार ने बताया कि उनके पिता करीब 20 साल पहले दो बैल लेकर आए थे। दोनों को मामा-भांजा नाम दिया गया। पिता का कहना था कि ये परिवार के सदस्य हैं और इसी भावना के साथ दोनों का पालन-पोषण किया गया। दोनों बैल करीब दो दशक तक खेती के काम में परिवार का साथ देते रहे।
दिनेश ने बताया कि दोनों बैलों का परिवार से इतना लगाव हो गया था कि खेत से घर और घर से खेत तक वे कई बार बिना किसी के साथ खुद ही आ-जा जाते थे। खेती के काम में दोनों ने वर्षों तक साथ दिया। परिवार के लोग भी उन्हें पशु नहीं, बल्कि घर के सदस्य की तरह ही मानते थे।
एक बैल की मौत वर्ष 2024 में हो गई थी
मामा नाम के बैल की मौत वर्ष 2024 में हो गई थी। वहीं भांजे नाम के बैल की मौत करीब 13 दिन पहले हुई। इसके बाद परिवार ने दोनों की संयुक्त तेरहवीं करने का निर्णय लिया। शनिवार को विधि-विधान से क्रियाकर्म के बाद गांव के लोगों के लिए भोज रखा गया। किसान के इस भाव को देखकर ग्रामीण भी भावुक हो गए।
दिनेश पाटीदार के पास करीब 24 बीघा जमीन है, जिस पर वे खेती करते हैं। परिवार ने दोनों बैलों के प्रति अपनी श्रद्धा जताते हुए उनकी अस्थियों का विसर्जन भी उज्जैन में किया। दो दशक तक खेत में किसान का साथ निभाने वाले ये दोनों बैल अब नहीं हैं, लेकिन परिवार के लिए उनकी यादें आज भी जीवंत हैं।