ओम द्विवेदी, सागर Premchand Birthday 31 July । कलम के सिपाही और कथा सम्राट कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद का सागर से पारिवारिक रिश्ता रहा है। उन्होंने अपनी बेटी का ब्याह सागर जिले के देवरी में किया था। बेटी के विवाह के बाद वे कई बार सागर आए और कई-कई दिनों तक रुके। कहा जाता है कि पूस की रात नामक कालजयी कहानी उन्होंने यहीं लिखी थी। सुखचैन नदी के किनारे स्थित बेटी का घर ठंड के दिनों में पूरी तरह से बर्फीला हो जाता था। वहीं पर पूस माह की किसी रात में एक गरीब की ठंड की असह्य वेदना लिखी गई। गांव में यह किंवदंती आज लोगों जुबान पर है।
प्रेमचंद की दूसरी पत्नी शिवरानी देवी की किताब प्रेमचंद घर में... में इस बात का जिक्र है कि बेटी कमलादेवी का विवाह उन्होंने 1928 में देवरी के वासुदेव प्रसाद श्रीवास्तव के साथ किया था। सामान्य पिता की तरह उन्होंने पहले आसपास ही कानपुर और लखनऊ में बेटी के कई लिए रिश्ते तलाशे थे, लेकिन बात न बनी।
बाद में देवरी में सुखचैन नदी के किनारे रह रहे मालगुजारों के इस सम्पन्न परिवार में शादी हुई। कुछ साल बाद सागर आ गए और यहीं रहने लगे। कालांतर में उन्होंने सिविल लाइंस स्थित जमीन बेच दी, जिस पर आज व्यावसायिक प्रतिष्ठान बने हुए हैं।
दामाद सागर में करते थे वकालत
प्रेमचंद जी के दामाद वासुदेव प्रसाद जी पहले देवरी में रहते थे, बाद में सागर आए और सिविल लाइन में अपना निवास बनाया। कुछ समय तक परकोटा में भी रहे। यहीं रहकर वकालत करते थे। बेटी के आने के बाद प्रेमचंद का देवरी और सागर आना-जाना लगा रहा। कई बार में लंबे समय तक बेटी कमला देवी के साथ रहे थे। ऐसी संभावना है कि उन्होंने पूस की रात कहानी देवरी में रहने के दौरान लिखी हो। यह भी हो सकता है कि उसका पहला ड्रॉफ्ट यहां तैयार हुआ हो और बाद में उसे उन्होंने परिमार्जित किया हो। यह किसी भी लेखक की स्वाभाविक रचना प्रक्रिया है। -प्रो. कांतिकुमार जैन, वरिष्ठ साहित्यकार, सागर
एलएलबी कराने ले गए थे प्रयागराज
देवरी के साहित्यप्रेमी आज भी प्रेमचंद को लेकर खासे रोमांचित रहते हैं। उन्हें इस बात का गर्व है कि उनके गांव में प्रेमचंद का आना-जाना रहा है। गांव के लोग यह मानते हैं कि पूस की रात देवरी में लिखी गई है और उस प्रचंड ठंड का एहसास उन्होंने यहीं किया था। 1928 में कमलादेवी जी का देवरी में विवाह हुआ और 1932 में वासुदेव जी का परिवार सागर आ गया। बताया जाता है कि बेटी मां बनने वाली थी, तब प्रेमचंद कई दिनों तक सागर में रहे थे। उन्होंने ही शिवदयाल जी को वकालत के लिए प्रेरित किया और प्रयागराज ले जाकर एलएलबी कराया। - टीकाराम त्रिपाठी, साहित्यकार एवं अध्यक्ष, प्रगतिशील लेखक संघ, सागर
कहानी पूस की रात का एक अंश
पूस की अंधेरी रात! आकाश पर तारे भी ठिठुरते हुए मालूम होते थे। हल्कू अपने खेत के किनारे ऊख के पत्तों की एक छतरी के नीचे बांस के खटोले पर अपनी पुरानी गाढ़े की चादर ओढ़े पड़ा कांप रहा था। खाट के नीचे उसका संगी कुत्ता जबरा पेट में मुंह डाले सर्दी से कूं-कूं कर रहा था। दो में से एक को भी नींद न आती थी। हल्कू ने घुटनियों को गरदन में चिपकाते हुए कहा, क्यों जबरा, जाड़ा लगता है? कहता तो था, घर में पुआल पर लेट रह, तो यहां क्या लेने आए थे? अब खाओ ठंड, मैं क्या करूं? जानते थे, मैं यहां हलुवा-पूरी खाने आ रहा हूं, दौड़े-दौड़े आगे-आगे चले आए। अब रोओ नानी के नाम को। जबरा ने पड़े-पड़े दुम हिलाई और अपनी कूं-कूं को दीर्घ बनाता हुआ एक बार जम्हाई लेकर चुप हो गया। उसकी श्वान-बुध्दि ने शायद ताड़ लिया, स्वामी को मेरी कूं-कूं से नींद नहीं आ रही है। हल्कू ने हाथ निकालकर जबरा की ठंडी पीठ सहलाते हुए कहा, कल से मत आना मेरे साथ, नहीं तो ठंडे हो जाओगे। यह रांड पछुआ न जाने कहां से बरफ लिए आ रही है। उठूं, फिर एक चिलम भरूं। किसी तरह रात तो कटे! आठ चिलम तो पी चुका। यह खेती का मजा है!