बीना (नवदुनिया न्यूज)। संसार में हर इंसान खुद के लिए जी रहा है। लोगों ने पड़ोसी से नाता रखना भी बंद कर दिया है। लेकिन ध्यान रहे यह सनातन धर्म की संस्कृति नहीं है। सनातन धर्म में कहा गया है कि जो इंसान दूसरों के दुखों को देखकर दुखी होता वही मनुष्य हैं। दूसरों को दुखी देखकर खुश होने वाला तो दैत्य के समान हैं। इसलिए हमें हमेशा बुरे वक्त में दूसरों की मदद करनी चाहिए। यह बात खिमलासा रोड पर चल रही राम कथा के आठवें दिन रविवार को विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए बागेश्वर धाम सरकार संत धीरेंद्र शास्त्री जी ने कही।
कथा में उन्होंने आगे कहा कि खुद के लिए दानव जीते हैं, इंसान तो वह है जो दूसरे को दुखी देखकर खुद भी दुखी हो। इसका उदाहरण साधु-संत हैं। साधु हमेशा भक्तों की भलाई के लिए जीते हैं। उन्होंने कहा बागेश्वर धाम के सन्यासी बाबा जीते जी भक्तों का भला सकते रहे और दिव्य आत्मा बनकर भक्तों का कल्याण कर रहे हैं। जिस तरह नदी कभी खुद का पानी नहीं पीती उसी तरह संत साधना करके उसका फल भक्तों को देते हैं। उन्होंने कहा कि इसी तरह मनुष्य को यदि दूूसरे की पीढ़ा देखकर दुख नहीं होता तो वह इंसान नहीं है, बल्कि मनुष्य की यौनि में राक्षस है। आगे उन्होंने कहा कि संसार में परोपकार से बड़ा कोई धर्म नहीं है, इसलिए जब भी अवसर मिले परोपकार करने से पीछे नहीं रहना चाहिए। क्योंकि परोपकार करने वाले का मन निर्मल होता है और जिसका मन निर्मल होता है उसके मन में भगवान राम वास करते हैं। राम की भक्ति करते हुए परोपकार करने वाले उनके धाम को जाते हैं। क्योंकि भगवान को निर्मल मन वाले भक्त अति प्रिय हैं। भक्ति का दिखावा करने वालों पर परमात्मा की कभी कृपा नहीं होती। इसलिए भगवान की भक्ति हमेशा निर्मल मन से करनी चाहिए।