अतुल तिवारी, सागर। ओलिम्पिक जैसे बड़े टूर्नामेंट शुरू होते ही आम लोगों के साथ ही मंत्री और नेता देश के खिलाड़ियों से मेडल लाने की उम्मीदें लगा लेते हैं, लेकिन इन टूर्नामेंट्स के लिए खिलाड़ी किस तरह तैयार किए जाते हैं? यह अभी हमें सीखना होगा। हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की जयंती को राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है, लेकिन इसी खेल में राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन कर चुके कुछ खिलाड़ी ऐसे भी हैं जिनकी दयनीय हालत हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम खेलों में अपना भविष्य तलाश सकते हैं।
खेल दिवस पर नवदुनिया रिपोर्टर बेहतरीन प्रदर्शन कर चुके शहर के कुछ खिलाड़ियों से मिलने पहुंचे। संवाददाता ने कैंट इलाके में एक छोटे से मकान के बाहर हाथ ठेले पर बैठे बुजुर्ग से पूछा..दादा, यहां प्रेमसिंह राजपूत कहां रहते हैं... बुजुर्ग ने कहा बताइए...मैं ही हूं प्रेमसिंह..एक पल तो भरोसा नहीं हुआ, लेकिन पास में खड़े एक व्यक्ति ने कहा कि यही प्रेमसिंह हैं। यकीन हो गया कि क्यों हमारा देश अच्छे खिलाड़ी पैदा नहीं कर पा रहा है।
बातचीत के दौरान प्रेमसिंह राजपूत ने बताया कि 1964 से नेशनल लेवल पर हॉकी टूर्नामेंट खेलें। टूर्नामेंट में सिल्वर मेडल जीता, लेकिन जीवन के इस आखिरी पड़ाव में हाथठेला चलाकर मजदूरी करना पड़ रहा है। प्रेमसिंह बताते हैं कि उन्होंने राष्ट्रीय स्तरीय पर कई हॉकी टूर्नामेंट खेले हैं। इन टूर्नामेंटों में उन्होंने करीब 30 राज्य स्तरीय और राष्ट्रीय स्तर के खेल प्रमाण पत्र और कई शील्ड-ट्रॉफी जीतीं, लेकिन करीब छह साल पहले इटारसी स्टेशन से उनका सूटकेस चोरी हो गया। जिसमें सारे प्रमाण पत्र और मेडल थे। प्रेमसिंह राजपूत बताते हैं कि खेल की वजह से ही उनकी आर्मी में नौकरी लगी।
1971 में पाकिस्तान के खिलाफ उन्होंने पूंछ सेक्टर में युद्ध भी लड़ा। लेकिन इसके बाद किन्हीं कारणों से उन्होंने आर्मी से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद नेपानगर स्थित अखबारी कागज के कारखाने में जाकर काम करने लगे। वहां से लौटते वक्त छह साल पहले इटारसी स्टेशन से सूटकेस चोरी हुआ था। अब पिछले पांच सालों से हाथठेला चला कर अपना भरणपोषण कर रहे हैं। प्रेमसिंह ने शादी नहीं की है और वह अपनी बहिन के घर में रहकर जीवन गुजार रहे हैं।
फिर जगाना होगा जादू
शहर से हॉकी का खेल खत्म हो गया है। अब तो क्रिकेट चल रहा है। लोग अब हॉकी में ज्यादा रूचि ही नहीं लेते। हॉकी को बचाने के लिए लोगों में हॉकी के जादू को फिर से जगाना होगा।
प्रेमसिंह राजपूत, पूर्व हॉकी खिलाड़ी