
शिवम कृष्ण त्रिपाठी, नईदुनिया, सतना। भाई-बहन का रिश्ता सिर्फ खून के रिश्ते तक सीमित नहीं होता। कई बार विपरीत परिस्थितियों में कोई अजनबी आगे बढ़कर ऐसा फर्ज निभाता है, जो अपनों से भी बढ़कर होता है। सतना के रत्नाकर चतुर्वेदी ‘शिवा’ ऐसे ही लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने जरूरतमंद और असहाय बेटियों के लिए भाई बनकर जिम्मेदारियां उठाईं।
शिवा के लिए ये बेटियां सिर्फ मदद पाने वाली जरूरतमंद बच्चियां नहीं हैं, बल्कि बहनें हैं। यही वजह है कि रक्षाबंधन पर उनकी कलाई अलग-अलग परिवारों की बहनों की राखियों से भर जाती है। किसी के लिए वह भाई हैं, किसी के लिए बेटे की कमी पूरी करने वाला सहारा और किसी के लिए मुश्किल समय में उम्मीद।
खून के रिश्ते से बने भाई-बहन तो बहुत होते हैं, लेकिन मुश्किल समय में जिम्मेदारी उठाकर रिश्ते को निभाने वाले भाई कम ही मिलते हैं। रत्नाकर चतुर्वेदी ‘शिवा’ की ये पहल इसी विश्वास को मजबूत करती है कि भाई होना केवल राखी बंधवाने का रिश्ता नहीं, बल्कि जरूरत के समय बहन के साथ मजबूती से खड़े रहने का संकल्प भी है।
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21 अप्रैल 2023 को अनुष्का गुप्ता के पिता की ट्रेन हादसे में मौत हो गई। परिवार के सामने आर्थिक और सामाजिक संकट खड़ा हो गया। ऐसे समय में रत्नाकर चतुर्वेदी ‘शिवा’ ने परिवार का सहारा बनने की पहल की। उन्होंने नगर निगम में आवेदन कर अनुष्का के परिवार को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास दिलाने में मदद की।

परिवार की छोटी बेटी की पढ़ाई और बाजार आने-जाने की जरूरत को देखते हुए शिवा ने उसे स्कूटी भी उपलब्ध कराई। 1 अप्रैल 2025 को अनुष्का को स्कूटी दी गई। उनके लिए यह मदद महज एक वाहन देना नहीं, बल्कि बेटी को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक कदम था।
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इसी तरह अन्नपूर्णा के परिवार पर भी उस समय दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, जब चार बहनों के इकलौते भाई प्रदीप की सड़क हादसे में मौत हो गई। प्रदीप अपनी बहन अन्नपूर्णा के लिए वर तलाश रहा था, लेकिन शादी से पहले ही हादसे में उसकी जान चली गई। एक तरफ परिवार ने अपना इकलौता बेटा खो दिया, वहीं दूसरी ओर बेटी की शादी की जिम्मेदारी भी सामने खड़ी थी।
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ऐसे समय में रत्नाकर चतुर्वेदी ‘शिवा’ ने परिवार के बेटे और अन्नपूर्णा के भाई की भूमिका निभाने का निर्णय लिया। 21 जून को उन्होंने अन्नपूर्णा की शादी की पूरी जिम्मेदारी उठाई। विवाह के लिए पंडाल-मंडप से लेकर बारातियों के स्वागत, भोजन और अन्य व्यवस्थाओं तक का खर्च उन्होंने उठाया।
शिवा ने परिवार को भरोसा दिलाया कि प्रदीप के चले जाने के बाद वे खुद को अकेला न समझें। जिस तरह एक बेटा और भाई परिवार के साथ खड़ा होता है, उसी तरह वह आगे भी उनके साथ खड़े रहेंगे। तिलक की रस्म निभाने के साथ बहन को उपहार भी दिए और विदाई की व्यवस्था की।
शिक्षा किसी भी बच्चे के भविष्य की पहली सीढ़ी है। आर्थिक तंगी के कारण यदि किसी बच्चे की पढ़ाई रुक जाए तो उसका असर पूरे जीवन पर पड़ सकता है। कृष्णनगर स्थित सरस्वती विद्यालय से जुड़े एक मामले में भी शिवा ने संवेदनशील पहल करते हुए जरूरतमंद बच्ची की शिक्षा का खर्च उठाने का संकल्प लिया है।
शिवा ने बच्ची की पढ़ाई को स्कूल और किताबों तक सीमित न रखते हुए उसके भविष्य की जिम्मेदारी लेने की बात कही। उनका कहना है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, किसी बेटी की पढ़ाई और सपनों को रुकने नहीं दिया जाना चाहिए।
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